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भारत में ईसाइयत का पहला कदम



भारत के आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र के पुत्र जवाँ बख़्श की शादी बडे़ धूमधाम से की गई। उस समय तक अंग्रेज़ी वर्चस्त बढ़ चुका था। बादशाह की आय में कटौती की जा चुकी थी पर मुग़लिया वैभव दिखाने का यही तो मौक़ा था जब एक शहज़ादे की शादी हो रही हो। तब तक ईसाई पादरी जॉन जेन्निंग्स को दिल्ली आए तीन माह हो चुके थे। उसे अहसास होने लगा था कि मुग़लिया सल्तनत किले की चार दीवारों तक ही सीमित रह गई है और मुसलमानों को ईसाइयत की ओर मोड़ने का सही समय आ गया है। उसका मानना था कि जिस सल्तनत ने ब्रिटिश राज को कोहेनूर जैसा हीरा दिया है तो बदले में ‘राज’ को भी ईसाई धर्म जैसा बेशकीमती मोती देना चाहिए!



जेन्निंग्स ईसाइयत फैलाने के लिए सभी जगह प्रचार-प्रसार करने में लग गया। जब वह कुम्भ मेले में गया और वहाँ पर लोगों को इकट्ठा करके ईसाई धर्म के गुण गिनाने लगा तो नागा साधुओं ने उसे वहाँ से भगा दिया।



मुगलिया सल्तनत दम तोड़ रही थी और अंग्रेज़ों के वर्चस्व को देखते हुए जहाँ दिल्ली में जेन्निंग्स सक्रिय था, वहीं कलकत्ते में एडमंड्स भी यही कह रहा था कि बंगाल में अब हिन्दुत्व का पतन हो रहा है और ईसाई धर्म के प्रचार का सही समय आ गया है। उधर पेशावर के कमिश्नर, हेवर्ट एड्वर्ड का भी यही विचार था कि ब्रिटेन को ईश्वर ने यह एक मौका दिया है कि ईसाइयत का प्रचार-प्रसार हो और इसके माध्यम से अंग्रेज़ों का प्रभाव बढे़। फतेहपुर के डिस्ट्रिक्ट जज राबर्ट टक्कर ने पत्थर की शिलाओं पर फ़ारसी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में ‘टेन कमान्डमेंट्स’ तराश कर लगवाए और सप्ताह में तीन दिन हिन्दुस्तानियों को इकट्ठा कर के बाइबल का पाठ करते रहे।



जेन्निंग्स से पूर्व आए पादरियों ने सौहार्दपूर्वक ईसाइयत फैलाने का कार्य किया था। ईसाई साहित्य के पर्चे बाँटते, जिसे उलेमाओं ने इसलिए नज़रअंदाज़ किया था कि आम आदमी इससे प्रभावित नहीं हो रहा है। जेन्निंग्स का मानना था कि जब तक प्रचार में आक्रमकता नहीं आती तब तक ईसाइयत की पैठ कठिन है। उसका मानना था कि दिल्ली की २६१ मिस्जिदों और २०० मंदिरों को हाथ में ले लेना चाहिए। वह खुल कर इस्लाम और पैग़म्बर पर आक्रमण करने लगा।



ब्रिटिश कानून में फेर-बदल करके कई मंदिरों, मस्जिदों, मदरसों और सूफ़ी दरगाहों की ज़मीन को ब्रिटिश राज के अंतर्गत कर लिया गया। सड़क विस्तारीकरण के नाम पर मंदिरों और मस्जिदों को ढहाया गया। कुछ प्रार्थना घरों को पादरियों के हवाले कर दिया गया ताकि गिरजाघर खोले जा सके। सरकार के इन कदमों से हिंदू और मुसलमान खिन्न हो गए। शायद यहीं पड़ी थी १८५७ के ‘गदर’ की पहली नींव!!!!

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