गुरुवार, 31 जुलाई 2014

UP Budget 2014-15

वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट अनुमानों
पर माननीय मुख्य मंत्री जी
का बजट भाषण
माननीय अध्यक्ष महोदय,
माह फरवरी, 2014 में मैंने इस सम्मानित सदन के समक्ष वित्तीय वर्ष 2014-2015 का अन्तरिम बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तीय वर्ष के प्रथम चार माहों- अप्रैल से जुलाई, 2014 तक की अवधि हेतु वचनबद्ध खर्चों और चालू योजनाओं के लिए लेखानुदान पारित कराया था । अब मैं आपकी अनुमति से वित्तीय वर्ष 2014-2015 का सम्पूर्ण बजट इस सम्मानित सदन के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
मान्यवर,
उदारीकरण के बाद से भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से औद्योगीकरण पर आधारित रहने लगी और कृषि क्षेत्र को प्रमुख आर्थिक क्षेत्र के बजाय सहयोगी आर्थिक क्षेत्र मान लिया गया । इससे कृषि और ग्रामीण क्षेत्र धीरे-धीरे विकास की मुख्यधारा से कटते जा रहे हैं । इसके फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार और अन्य नागरिक सुविधाओं का विकास आजादी के 60 वर्षांे बाद भी आबादी की मांग व हमारी सोच के अनुरूप नहीं हो पाया। जोतों के विभाजन और अलाभकारी कृषि तथा गाँवों में निम्न जीवनस्तर के परिणामस्वरूप रोजगार और बेहतर नागरिक सुविधाओं की तलाश में ग्रामीण जनता का शहरों की तरफ पलायन हो रहा है जो शुभ संकेत नहीं है।
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महोदय,
दो तरह की चुनौतियां सरकार के सामने मौजूद हैं-प्रथम यह कि शहरी क्षेत्रों में बढ़ती जनसंख्या को सुचारू जीवन प्रदान करना जिसमें जनता को सुरक्षा, रोजगार, बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल, सड़क और सार्वजनिक परिवहन प्रणाली सुलभ रहे, दूसरा यह कि ग्रामीण क्षेत्र में कृषि को लाभकारी बनाया जाय और ग्रामीण जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार के लिये मूलभूत सुविधायें विकसित की जायें जिससे ग्रामीण क्षेत्र में भी उच्च स्तर की सड़कें, पानी, बिजली, सुरक्षा, शिक्षा व चिकित्सा की सुविधायें सुलभ हों। हमारी सरकार इन चुनौतियों के प्रति पूर्णतया सजग है।
मान्यवर,
बजट केवल एक दस्तावेज या आमदनी और खर्चे का लेखा-जोखा नहीं बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक विकास और परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम है । हमारा यह बजट एक साधारण बजट न होकर नई आशा और प्रतिबद्धता का बजट है ।
इस बजट में समाज के हर वर्ग के लिये आशा और प्रतिबद्धता का संदेश है । उस रिक्शा चालक के लिये है, जो शहर में शरीर को झुलसा देने वाली धूप में रिक्शा चलाने के लिए मजबूर है । उस छोटे किसान के लिए है जो कड़ी धूप में बैलों की मदद से अपना खेत जोतता है, हमारे नौजवानों के लिये है जिनके बेहतर रोजगार के लिए उनके कौशल (ैापसस) का विकास होना है, अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग के लिये जिन्हें सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति की राह पर तेजी से
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ले जाकर उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ना है, महिलाओं को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिये तथा उद्यमियों के लिए ताकि वे प्रदेश में अधिक से अधिक उद्योग स्थापित करें और रोजगार के अवसर सृजित हों । अल्पसंख्यकों के कल्याण, सामाजिक सुरक्षा और विकास की योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है ।
मान्यवर,
मैं आज इस सम्मानित सदन के माध्यम से प्रदेश की जनता का आह्वाहन करता हूँ कि आइये हम सब मिलकर अविलम्ब गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी जैसे अभिशापों को जड़ से समाप्त करने का संकल्प लें । हम यह संकल्प भी लें कि हम पर्यावरण को संरक्षित करने और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये अपना भरपूर योगदान देंगे । हमारा आने वाला कल वर्तमान में हमारी सोच, हमारे विश्वास, हमारी दृष्टि और हमारी कर्मठता पर निर्भर होगा। हमें आज यह प्रण लेना है कि हमें प्रदेश और समाज के विकास के पथ पर मन्थर गति से चलने के बजाय तीव्र गति से दौड़ना है ।
मैं यह विश्वास दिलाता हूँ कि हमारी सरकार जनता के साथ इस प्रयास में बराबर की सहभागी रहेगी और जनता को हर संभव सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करेगी । विकास कीे इस दौड़ में आने वाली तमाम बाधाओं और रूकावटों को दूर करने में हम जनता के सहयोग की भी अपेक्षा करते हैं।
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मान्यवर,
मैं इस सदन के सम्मानित सदस्यों के माध्यम से जनता तक यह संदेश पहुंचाना चाहता हूँ कि हमारे लिये यह जानना और समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि हमें अपने आने वाले कल का निर्माण करने के लिये निर्णय लेने का आज उपयुक्त अवसर है ।
मैं जनता से यह भी कहना चाहता हूँ कि मुझे हर उस व्यक्ति पर पूर्ण विश्वास है जिसकी आखों में बेहतर कल के लिए एक सपना है । हम इस सपने को साथ मिलकर पूरा करेंगे ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है ।
मान्यवर,
हमारी सरकार ने अपने कार्यकाल के पिछले दो वर्षों में जनता के हित में तेज गति के साथ प्रदेश को विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाने का अथक एवं सार्थक प्रयास किया है । इसी का परिणाम रहा है कि विगत दो वर्षों में प्रदेश के आर्थिक विकास की दर देश की आर्थिक विकास दर से अधिक रही है।
हमारी सरकार ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद अनेक नई एवं महत्वाकांक्षी योजनायें आरम्भ की हैं । हमने प्रदेश के विकास के लिए एजेण्डा तैयार किया है जिसमें औद्योगिक निवेश हेतु अनुकूल वातावरण सृजित कर निजी निवेश आकर्षित करने, किसानों की आय बढ़ाने हेतु कृषि एवं सिंचाई क्षेत्र के विकास, सड़कों का विकास, ऊर्जा क्षेत्र में सुधार, सभी वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, श्रमिकों, युवाओं का उत्थान एवं
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कौशल विकास, ग्राम्य तथा नगरीय विकास की योजनाओं के साथ-साथ प्रशासन तंत्र को कुशल एवं प्रभावी बनाने के प्रयास शामिल हैं ।
उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 20 करोड़ है जिसमें से साढ़े पन्द्रह करोड़ लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। सबसे पहले कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिये कृषि नीति, 2013 का प्रभावी कार्यान्वयन करते हुये उत्पादकता में वृद्धि के लिये आवश्यक व्यवस्थायें की गयी हंै। खेती के अलावा डेयरी, कुक्कुट पालन एवं मत्स्य पालन के व्यवसायों को भी बढ़ावा देने की योजनायें बनायी गयी हैं ।
मुझे यह बताते हुये अपार हर्ष है कि प्रदेश में अवस्थापना और औद्योगिक क्षेत्र में निवेश को आकर्षित करने के उद्देश्य से 12 जून, 2014 को नई दिल्ली में ”निवेशक सम्मेलन“ आयोजित किया गया जिसमें देश विदेश की लगभग 150 कम्पनियों द्वारा भाग लिया गया । यह सम्मेलन अत्यन्त सफल रहा और 23 कम्पनियों ने लगभग 54,606 करोड़ रुपये के समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किये । यह समझौता ज्ञापन खाद्य प्रसंस्करण, विनिर्माण, सौर ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूर संचार आदि विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं। इस सम्मेलन में कनाडा, नीदरलैण्ड, तुर्की, पोलैण्ड, इटली और ताइपे देशों के राजनयिकों द्वारा भी भाग लिया गया और प्रदेश में निवेश की सम्भावनाओं को खोजने हेतु बातचीत की। इस प्रकार सरकार द्वारा निवेशकों के साथ सीधा संवाद स्थापित कर प्रदेश में निवेश
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की नई सम्भावनाओं को सृजित करने का प्रयास किया जा रहा है।
कानून व्यवस्था सभ्य समाज के विकास की आधारशिला है । बिना मजबूत कानून व्यवस्था और समाज में शान्ति और न्याय के शासन के किसी भी क्षेत्र में विकास सम्भव नहीं है। उत्तर प्रदेश जनसंख्या के हिसाब से देश का सबसे बड़ा राज्य है और दूसरे राज्यों की तुलना में पुलिस बल व संसाधनों की कमी है। प्रदेश को मजबूत कानून व्यवस्था देना हमारी प्राथमिकता है। इसके लिये पुलिस बल में वृद्धि, संचालन और आधुनिकीकरण हेतु 12,400 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है।
अवस्थापना सुविधाओं में बिजली, सड़क और सिंचाई प्रमुख हंै। बिजली का संकट लगभग सभी प्रदेशों में है। प्रदेश में बिजली की व्यवस्था मजबूत करने के उद्देश्य से बिजली की परियोजनाओं के लिये 23,928 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है।
गाँवों में घरों में शौचालय निर्माण हेतु संचालित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम के अंतर्गत अनुदान मद में लगभग 359 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है । गाँवों में घरों में शौचालयों के निर्माण से ग्रामीण जनता, विशेष रूप से बालिकाओं एवं महिलाओं को अत्यधिक सुविधा मिलेगी।
कुक्कुट विकास नीति, 2013 के अन्तर्गत ब्रायलर पैरेन्ट फार्मिंग की 10 इकाई तथा कामर्शियल लेयर फार्मिंग की 80 इकाई स्थापित किये जाने का लक्ष्य है जिससे लगभग 367 करोड़
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अण्डे तथा 9 से 10 करोड़ किलोग्राम कुक्कुट माँस प्रतिवर्ष उत्पादित होगा ।
मान्यवर,
हमारी सरकार ने सामाजिक सुरक्षा की एक नई महत्वाकांक्षी योजना का सूत्रपात इस बजट के माध्यम से किया है।
समाज के सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सही प्रतिनिधित्व देते हुए प्रदेश के ग्रामीण व नगरीय क्षेत्र के ऐसे गरीब परिवार, जिनके पास आय के उपयुक्त साधन उपलब्ध नहीं हैं, के जीवन यापन, आर्थिक व सामाजिक उन्नयन हेतु आर्थिक सहायता दिये जाने के उद््देश्य से ”समाजवादी पेंशन योजना“, वित्तीय वर्ष 2014-2015 से प्रारम्भ की जा रही है ।
इसके अंतर्गत 40 लाख परिवारों के एक-एक लाभार्थी को लाभान्वित कराये जाने का लक्ष्य है । योजना के अन्तर्गत प्रत्येक परिवार के मुखिया को न्यूनतम 500 रुपये प्रति माह से प्रारम्भ कर लाभान्वित परिवार की पेंशन में प्रतिवर्ष 50 रुपये की वृद्धि करते हुये पेंशन की अधिकतम धनराशि 750 रुपये प्रतिमाह तक होगी ।
परिवार की महिला मुखिया को एवं महिला मुखिया के न होने की दशा में परिवार के पुरूष मुखिया को लाभार्थी बनाया जायेगा ।
इस योजना के लिये वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट में 2,424 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
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मान्यवर,
हमारा यह मानना है कि अवस्थापना सुविधाओं में सुधार के बिना, सर्वांगीण और स्थायी विकास सम्भव नहीं है। यहाँ मैं कुछ चुनिंदा योजनाओं व कार्यक्रमों के बारे में बताना चाहँूगा ।
दिल्ली-मुम्बई इण्डस्ट्रियल काॅरिडोर परियोजना से प्रदेश के 12 जनपदों का 36 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आच्छादित होगा । इस काॅरीडोर के दोनों तरफ 250 किलोमीटर के क्षेत्र में औद्योगिक क्षेत्र एवं परिक्षेत्र विकसित किये जायंेगे ।
ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट काॅरिडोर परियोजना कोलकता से शुरू होकर वाराणसी से उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर पूरे प्रदेश से निकलते हुए अमृतसर तक जायेगी । प्रदेश सरकार ने इस सम्बन्ध में भारत सरकार से प्रयास कर इसके समानान्तर औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने का निर्णय कराया है जिससे पूरे प्रदेश को लाभ मिलेगा।
गाजियाबाद शहर में मेट्रो रेल विस्तार कार्यक्रम के अन्तर्गत 1,838 करोड़ रुपये की लागत से 11.11 किलोमीटर लम्बी मेट्रो रेल परियोजना क्रियान्वित किये जाने की कार्यवाही की जा रही है ।
लखनऊ में चक गंजरिया फार्म में उपलब्ध कुल 846 एकड़ भूमि में से 320 एकड़ भूमि पर अवस्थापना सुविधाओं यथा-100 एकड़ भूमि पर आई0टी0 सिटी, 50 एकड़ भूमि पर भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, 100 एकड़़ भूमि में विश्व स्तरीय कैंसर संस्थान, मेडीसिटी तथा अन्य चिकित्सा सुविधाएं तथा 20 एकड़ भूमि पर पी0पी0पी0 मोड
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पर सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल/कार्डियोलाॅजी सेन्टर, 20 एकड़ भूमि पर आधुनिक दुग्ध प्रसंस्करण प्लाण्ट व 25 एकड़ भूमि पर प्रशासनिक प्रशिक्षण अकादमी की स्थापना किये जाने का निर्णय लिया गया है ।
मान्यवर,
हमारी सरकार द्वारा विकास की योजनाओं का लाभ सभी वर्गों तक पहुँचाने के उद््देश्य से हर क्षेत्र में पारदर्शी व्यवस्था बनाई गई है । इसके अलावा ऐसी नीतियाँ बनाई गई हैं जिनसे विकास योजनाओं को समय से पूरा किया जा सके । निश्चित रूप से इन योजनाओं का लाभ प्रदेश के कमजोर वर्गों, महिलाओं, बच्चों, नौजवानों, अल्पसंख्यकों, श्रमिकों तथा किसानों को मिलेगा और उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में सुधार होगा ।
प्रथम चरण में नौजवानों के भविष्य को संवारने तथा उज्जवल बनाने के उद्देश्य से हमारी सरकार ने लैपटाप वितरण, बेरोजगारी भत्ता, कन्या विद्याधन आदि कुछ कार्यक्रम शुरू किये थे, जिसका अधिकाधिक लाभ नौजवान युवक-युवतियों को मिला है। अब दूसरे चरण में हमारी सरकार की योजना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से निर्धन बस्तियों में जीवन की आधारभूत तथा मूलभूत सुविधायें मुहैया करायी जाय। इन कार्यक्रमों व अवस्थापना सुविधाओं को विकसित करने तथा पँूजी निवेश को प्रोत्साहित कर प्रदेश में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिये इस बजट में विशेष प्रावधान किये गये हैं।
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सामान्य आर्थिक परिदृश्य
वर्ष 2013-2014 के अग्रिम अनुमान के अनुसार प्रदेश की विकास दर 5.2 प्रतिशत रही जो देश की विकास दर 4.9 प्रतिशत से अधिक है । वर्ष 2012-2013 में प्रदेश की प्रति-व्यक्ति आय 33,137 रुपये थी, जो वर्ष 2013-2014 में बढ़कर 37,579 रुपये हो गयी है ।
प्रदेश की वार्षिक योजना का आकार वर्ष 2011-2012 में 47,000 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2012-2013 में 23 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 57,800 करोड़ रुपये हो गया । इतना ही नहीं, वर्ष 2013-2014 में प्रदेश की वार्षिक योजना का आकार पुनः 20 प्रतिशत बढ़कर 69,200 करोड़ रुपये हो गया जो देश में किसी भी राज्य के लिये सबसे अधिक था।
अभी केन्द्रीय योजना आयोग के स्तर पर राज्य की 2014-2015 की वार्षिक योजना को अन्तिम रूप नहीं दिया जा सका है। फिर भी वार्षिक योजना की नई वित्त पोषण की व्यवस्था के अन्तर्गत आयोजनागत पक्ष में 95,039 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जिसमें लगभग 75 प्रतिशत राशि कृषि, किसान और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की योजनाओं के लिए हंै ।
मान्यवर,
अब मैं आपकी अनुमति से वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट की संक्षिप्त रूपरेखा इस सम्मानित सदन के समक्ष रखना चाहूँगा ।
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 वित्तीय वर्ष 2014-2015 के लिये प्रस्तुत बजट का आकार दो लाख चैहत्तर हजार सात सौ चार करोड उनसठ लाख रुपये (2,74,704.59 करोड़ रुपये) है जो वर्ष 2013-2014 के बजट के सापेक्ष 24 प्रतिशत अधिक है ।
 इस आकार के बजट को वित्त पोषित करने हेतु बजट में संसाधनों की समुचित व्यवस्था की गई है, जिसमें प्रदेश के स्वयं के कर राजस्व में वर्ष 2013-2014 की अपेक्षा लगभग 17 प्रतिशत की वृद्धि सम्मिलित है ।
 वर्ष 2014-2015 के बजट में बीस हजार नौ सौ सत्तावन करोड़ सैंतालिस लाख रुपये (20,957.47 करोड़ रुपये) की नई योजनायें सम्मिलित की गई हैं ।
 अवस्थापना सुविधाओं, यथा-सड़क, सेतु, सिंचाई एवं ऊर्जा के विकास, सुदृढ़ीकरण एवं रख-रखाव की योजनाओं के लिये उनचास हजार एक सौ आठ करोड़ रुपये (49,108 करोड़ रुपये) की व्यवस्था की गई है जो वर्ष 2013-2014 से लगभग 82 प्रतिशत अधिक है ।
 त्वरित आर्थिक विकास कार्यक्रमों के लिए 1,000 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 कृषि एवं सम्बद्ध सेवाओं के लिये सात हजार छः सौ पच्चीस करोड़ रुपये (7,625 करोड़
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रुपये) की व्यवस्था की गयी है जो वर्ष 2013-2014 से 15 प्रतिशत अधिक है।
 शिक्षा के विस्तार एवं गुणवत्ता में सुधार की योजनाओं के लिये इकतालिस हजार पाँच सौ अड़तीस करोड़ रुपये (41,538 करोड़ रुपये) की व्यवस्था की गयी है जो वर्ष 2013-2014 से 15 प्रतिशत अधिक है।
 चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के क्षेत्र में गुणात्मक सुधार एवं विस्तार हेतु चैदह हजार तीन सौ सतहत्तर करोड़ रुपये (14,377 करोड़ रुपये) की व्यवस्था की गई है जो वर्ष 2013-2014 की तुलना में लगभग 34 प्रतिशत अधिक है ।
 अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, विकलांग, अल्पसंख्यक तथा सामान्य वर्ग के गरीब व्यक्तियों के कल्याण की योजनाओं के लिये पच्चीस हजार पाँच सौ बाईस करोड़ रुपये (25,522 करोड़ रुपये) की व्यवस्था की गयी है, जो वर्ष 2013-2014 की तुलना में लगभग 26 प्रतिशत अधिक है ।
राजकोषीय परिदृश्य
 राज्य सरकार द्वारा वित्तीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबन्धन अधिनियम का अनुपालन सुनिश्चित किया जा रहा है । राज्य लगातार राजस्व बचत की स्थिति में है । राजकोषीय घाटा सकल घरेलू राज्य उत्पाद का 2.97 प्रतिशत तक रहने का अनुमान है। इसी प्रकार राज्य की ऋणग्रस्तता भी वर्ष 2014-2015 में
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निर्धारित सीमा (सकल राज्य घरेलू उत्पाद के 41.9 प्रतिशत) से काफी कम (27.8 प्रतिशत) अनुमानित है। राज्य सरकार द्वारा ऋण लेने की निर्धारित सीमा के अन्दर ही ऋण लिया जाना प्रस्तावित है। इन्हीं सभी प्रयासों का परिणाम है कि राज्य लगातार राजकोषीय स्थायित्व बनाए रखने में सफल रहा है।
मान्यवर,
विभागवार बजट प्रस्तावों को प्रस्तुत करने के पूर्व मैं, बजट में सम्मिलित कतिपय महत्वपूर्ण कार्यक्रमों और योजनाओं के बारे में इस सम्मानित सदन को बताना चाहूँगा ।
किसानों के लिए
 सहकारी चीनी मिल संघ की सदस्य मिलों पर गन्ना किसानों के बकाया गन्ना मूल्य के भुगतान हेतु 400 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 प्रदेश में गन्ने की औसत उपज एवं चीनी परता में वृद्धि किये जाने के उद्देश्य से चार वर्षांे में सम्पूर्ण बीज बदलाव का कार्यक्रम बनाया गया है जिसमें लगभग 350 करोड़ रुपये की धनराशि व्यय होने का अनुमान है ।
 सहकारी गन्ना समितियों को सोसाइटी कमीशन की प्रतिपूर्ति हेतु 252 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 नेशनल क्राॅप इन्श्योरेन्स योजना हेतु 95 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
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 भूमि सेना योजना के लिये 100 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 विगत कई वर्षों के बाद किसानों को पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित की गयी है । वर्ष 2012-2013 में कुल 85 लाख मीट्रिक टन उर्वरक वितरण के लक्ष्य के सापेक्ष 104 लाख मीट्रिक टन तथा वर्ष 2013-2014 में 83 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य के सापेक्ष 101 लाख मीट्रिक टन की उपलब्धता सुनिश्चित की गयी ।
 रसायनिक उर्वरकों के अग्रिम भण्डारण के लिये 100 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है ।
 वर्ष 2014-2015 में 90 लाख मीट्रिक टन उर्वरक वितरण का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें खरीफ के अन्तर्गत 36 लाख मीट्रिक टन एवं रबी के अन्तर्गत 53 लाख मीट्रिक टन उर्वरक वितरण किये जाने का लक्ष्य है ।
ग्रामीण क्षेत्रों का विकास
 प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के कार्यों के लिये 2593 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। योजना के द्वितीय चरण के अन्तर्गत प्रदेश के 3000 किलोमीटर मार्गों के उच्चीकरण का लक्ष्य है ।
 लखनऊ से आगरा तक 6 लेन के लगभग 300 कि0मी0 लम्बे एक्सप्रेस वे का निर्माण कराने की योजना पर कार्यवाही गतिमान है ।
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योजना हेतु 3280 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
 लोहिया ग्रामीण आवास योजना के अन्तर्गत 1500 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 डाॅ0 राम मनोहर लोहिया योजना के अन्तर्गत चयनित ग्रामों की अनजुड़ी बसावटों में संपर्क मार्गों के निर्माण एवं पुनर्निर्माण हेतु 800 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 इन्दिरा आवास योजना हेतु 1,800 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
 सी0सी0 रोड एवं के0सी0 ड्रेन तथा इण्टर लाॅकिंग टाइल्स हेतु 487 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है।
 श्री रामशरण दास ग्राम सड़क योजना में संपर्क मार्गों के निर्माण हेतु 50 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 ग्रामीण पेयजल हेतु 1598 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है।
विशेष क्षेत्र कार्यक्रम
 विशेष क्षेत्र कार्यक्रम के अन्तर्गत पूर्वांचल की विशेष परियोजनाओं हेतु 291 करोड़ रुपये तथा बुन्देलखण्ड की विशेष योजनाओं के लिये 758 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है । इस योजना के अन्तर्गत पूर्वांचल एवं बुन्देलखण्ड के पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु
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सिंचाई कार्यों, मार्र्गाें/सेतुओं का निर्माण, जलापूर्ति एवं अन्य विभिन्न कार्य आवश्यकतानुसार कराये जाते हैं।
 बुन्देलखण्ड क्षेत्र के 07 जनपदों यथा-झांसी, ललितपुर, जालौन, महोबा, हमीरपुर, बाँदा तथा चित्रकूट में सूखा राहत के लिये मल्टी सेक्टोरल एप्रोच के आधार पर कार्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं ।
 क्षेत्र में सूखे की समस्या के निदान हेतु जल प्रबन्धन तथा विकास कार्यों को त्वरित गति से क्रियान्वित करने हेतु त्वरित आर्थिक विकास योजना संचालित है। योजना के अन्तर्गत सड़क, पुल, पेयजल तथा स्वच्छता, विद्युत व्यवस्था, आदि को प्राथमिकता दी जायेगी।
शहरी क्षेत्रों का विकास
 राज्य वित्त आयोग की संस्तुति के अन्तर्गत प्रदेश की समस्त नगरीय निकायों के लिये 6,648 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है।
 तेरहवें वित्त आयोग की संस्तुतियों के अन्तर्गत प्रदेश की समस्त नागर स्थानीय निकायों के विकास के लिए 909 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 नागर स्थानीय निकायों को उनके क्षेत्रान्तर्गत अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तात्कालिक आवश्यकता के कार्यों हेतु उनकी मांग पर ब्याज रहित ऋण के रूप में धनराशि स्वीकृत किये जाने
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की नया सवेरा नगर विकास योजना हेतु वर्ष 2014-2015 में 900 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 आदर्श नगर योजना के अन्तर्गत 150 करोड़ रुपये, नगरीय सीवरेज योजना हेतु 75 करोड़ रुपये, नगरीय पेयजल कार्यक्रम के लिए 150 करोड़ रुपये, नगरीय सड़क सुधार योजना के लिए 100 करोड़ रुपये तथा नगरीय जल निकासी योजना के लिए 75 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 लखनऊ नगर के लिए मेट्रो रेल के संचालन हेतु लखनऊ मेट्रो रेल कारपोरेशन लिमिटेड का गठन किया जा चुका है । परियोजना के त्वरित क्रियान्वयन हेतु अग्रतर कार्यवाही की जा रही है । मेट्रो रेल परियोजना को गति प्रदान करने हेतु 95 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
कमजोर वर्गों के लिए
 वृद्धावस्था/किसान पेंशन योजना हेतु 1,613 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना हेतु 419 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
 निराश्रित विधवाओं के भरण पोषण तथा उनके बच्चों को शिक्षा आदि की व्यवस्था हेतु रुपये 607 करोड़ की व्यवस्था प्रस्तावित है।
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 नेत्रहीन, मूक बधिर एवं शारिरिक रूप से विकलांगों को उनके भरण पोषण हेतु 316 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है।
 विकलांग बच्चों की समेकित शिक्षा योजना के लिये 105 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
शहरी गरीबों के लिये
 मेहनतकशों, जिनकी आय रुपये 200 प्रतिदिन की दैनिक आय सीमा तक है, को आसरा योजना के अन्तर्गत निःशुल्क आवास उपलब्ध कराये जाने की योजना संचालित है।
इस योजना के अन्तर्गत वित्तीय वर्ष 2013-2014 में 22 जनपदों में स्वीकृत 8,076 आवासों का निर्माण कार्य प्रगति पर है। वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट में योजना में रुपये 335 करोड़ की व्यवस्था प्रस्तावित है, जिससे लगभग 8,500 आवासों के निर्माण का लक्ष्य है।
 नगरीय क्षेत्रों में अल्पसंख्यक बाहुल्य बस्तियों एवं अन्य मलिन बस्तियों में, जहाँ सड़कों और मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, में इण्टरलाकिंग सड़क, नाली निर्माण, जल निकासी इत्यादि मूलभूत अवस्थापना सुविधाओं के सृजन हेतु 375 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
 प्रदेश के रिक्शा चालकों को निःशुल्क मोटर/बैटरी/सौर ऊर्जा चालित अत्याधुनिक
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रिक्शा दिये जाने की योजना हेतु 300 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है जिससे लगभग 60 हजार रिक्शा चालक लाभान्वित होगें।
 शहरों को स्लम मुक्त करने की राजीव आवास योजना जो प्रदेश के 21 शहरों में संचालित है, हेतु 200 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
अधिवक्ताओं के लिए
 अधिवक्ताओं के कल्याणार्थ वित्तीय वर्ष 2014-2015 में 40 करोड़ रुपये की धनराशि का प्रस्ताव है ।
कानून व्यवस्था
प्रदेश में जनसामान्य को सुरक्षा प्रदान करने हेतु पुलिस द्वारा कठोर प्रयास किये जा रहे हैं, जिसके फलस्वरूप कानून व्यवस्था की स्थिति सुदृढ़ है ।
महिलाओं के उत्पीड़न की रोकथाम के लिये हेल्पलाईन 1090 की शुरूआत की गई है, जिस पर तत्काल मदद उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था है । महिलाओं के विरूद्ध घटित हिंसा की घटनाओं की रोकथाम के उद््देश्य से दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम-2013 लागू किया गया है, जिसमें विशेष रूप से प्रत्येक थाने में एक महिला पुलिस अधिकारी/पुलिस कर्मी हमेशा उपलब्ध रहने की व्यवस्था की गयी है । पुलिस महानिदेशक कार्यालय में एक वरिष्ठ महिला अधिकारी के अधीन विशेष
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प्रकोष्ठ व प्रत्येक जिलों में इसी प्रकार एक प्रकोष्ठ की स्थापना का निर्णय लिया गया है।
बच्चों के अधिकार, देख-रेख एवं संरक्षण के सम्बन्ध में प्रत्येक थाने में बाल कल्याण अधिकारी एवं विशेष किशोर पुलिस इकाई का गठन किया गया है ।
प्रदेश के सभी जनपदों में सड़क दुर्घटनाओं आदि की सूचना देने हेतु स्थापित टोल फ्री ट्रैफिक हेल्पलाईन के टेलीफोन नम्बर 1073 को क्रियाशील कर दिया गया है तथा उसे मोबाइल सेवा से जोड़ने की कार्यवाही गतिमान है ।
सभी जनपदों में साइबर क्राइम यूनिट का गठन किया गया है । वर्तमान में साइबर क्राइम के सम्बन्ध में 138 पुलिस उपाधीक्षकों/उपनिरीक्षकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है ।
पुलिस बल के आधुनिकीकरण जिसमें आवासीय एवं अनावासीय भवनों का निर्माण तथा उपकरणों एवं वाहनों का क्रय सम्मिलित है, के लिये 745 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
कृषि
बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि क्षेत्र की विकास दर 5.1 प्रतिशत प्राप्त करने का लक्ष्य है । उक्त लक्ष्य को प्राप्त किये जाने हेतु वर्ष 2014-2015 में खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य 594 लाख मीट्रिक टन एवं तिलहन उत्पादन का लक्ष्य 12 लाख मीट्रिक टन रखा गया है ।
वर्ष 2014-2015 में 61 लाख कुन्तल बीज वितरण का लक्ष्य है जिसमें खरीफ के अन्तर्गत 10
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लाख कुन्तल एवं रबी के अन्तर्गत 51 लाख कुन्तल है तथा बीज प्रतिस्थापन दर लगभग 39 प्रतिशत प्राप्त करने का लक्ष्य है ।
नेशनल फूड सेक्योरिटी मिशन योजना के लिये लगभग 178 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
उत्तर प्रदेश सोडिक भूमि सुधार परियोजना तृतीय हेतु 200 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था का प्रस्ताव है ।
कृषि विपणन यार्ड के निर्माण एवं विकास के लिये 88 करोड़ रुपये तथा सहकारी समितियों के माध्यम से अतिरिक्त भण्डारण क्षमता के विकास हेतु 70 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था का प्रस्ताव है ।
प्रमाणित बीजों के उपयोग को बढ़ावा देने हेतु अनुदान के लिये 81 करोड़ रुपये, संकर बीजों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिये 35 करोड़ रुपये तथा संकर मक्का बीज प्रोत्साहन योजना के लिये 25 करोड़ रुपये की सब्सिडी की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान को बढ़ावा दिये जाने के उद््देश्य से प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में भौतिक एवं तकनीकी अवसंरचना के सुदृढ़ीकरण एवं संवर्धन हेतु 227 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग
इस पेराई सत्र में प्रदेश में चीनी मिलों द्वारा 6,978 लाख कुन्तल गन्ने की पेराई कर 647 लाख कुन्तल चीनी का उत्पादन किया गया है और गन्ना
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किसानों को 11,668 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य का भुगतान कराया जा चुका है । पेराई सत्र 2012-2013 के देय गन्ना मूल्य के भुगतान में सहकारी क्षेत्र की मिलों का शत-प्रतिशत तथा निजी क्षेत्र की मिलों का 99.8 प्रतिशत भुगतान कराया जा चुका है ।
चीनी मिल क्षेत्रों में विपणन सुविधाओं के विकास हेतु अन्तग्र्रामीण सड़कों का निर्माण कराये जाने के निमित्त लगभग 37 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है तथा पूर्व निर्मित सम्पर्क मार्गों के सुदृढ़ीकरण के लिये 17 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
चीनी उद्योग आसवनी एवं को-जेनरेशन प्रोत्साहन नीति, 2013 के अन्तर्गत जनपद शाहजहाँपुर और जौनपुर में नई चीनी मिलों की स्थापना की कार्यवाही चल रही है।
ग्राम्य विकास
प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेराजगारी की समस्या को कम करने के साथ-साथ अवस्थापना सुविधाओं को सुदृृढ़ करना राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में है ।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत वर्ष 2014-2015 में लगभग 41 लाख परिवारों को 2018 लाख मानव दिवस का रोजगार उपलब्ध कराये जाने का लक्ष्य है ।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन प्रदेश के 22 जिलों के 22 विकासखण्डों में इन्टेन्सिव रूप से तथा
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शेष 800 विकास खण्डों में नाॅन इन्टेन्सिव रूप से संचालित की जा रही है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अन्तर्गत वर्ष 2014-2015 में 500 या उससे अधिक आबादी वर्ग की सभी जुड़ सकने योग्य बसावटों और सोनभद्र, चन्दौली, मिर्जापुर में 250 से अधिक आबादी वर्ग की सभी बसावटों को पक्की सड़कों से जोड़े जाने का लक्ष्य है ।
पंचायती राज
तेरहवें वित्त आयोग की संस्तुतियों के अनुसार जिला पंचायतों को सहायता प्रदान किये जाने हेतु अनुदान के लिये 666 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है । ब्लाॅक पंचायतों के लिये 333 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है । ग्राम पंचायतों को अनुदान हेतु 2,332 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
राज्य वित्त आयोग की संस्तुति के अन्तर्गत प्रदेश की पंचायती राज संस्थाओं के लिये 4,390 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था की गई है।
पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि से पोषित कार्यक्रमों के लिये 853 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
ग्रामीण क्षेत्रों में अन्त्येष्टि स्थलों के विकास हेतु 100 करोड़ रुपये की नई योजना प्रस्तावित है ।
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सहकारिता
अधिकोषण योजना के अन्तर्गत गैर लाईसेंस प्राप्त जिला सहकारी बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक से बैंकिंग लाईसेंस प्राप्त किये जाने हेतु सहायतार्थ 610 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
प्रारम्भिक सहकारी कृषि ऋण समितियों के माध्यम से कृषकों को कम ब्याज दर पर फसली ऋण उपलब्ध कराये जाने हेतु समितियों को अनुदान के लिये 50 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
कृषि ऋण राहत योजना के अंतर्गत 129 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
दुग्ध विकास
उत्तर प्रदेश वर्ष 2013-2014 में 242 लाख मी0 टन दुग्ध उत्पादन के साथ देश में प्रथम स्थान पर रहा । वर्ष 2014-2015 में दुग्ध उत्पादन का लक्ष्य 300 लाख मी0 टन है ।
लखनऊ में 05 लाख लीटर, कानपुर में 10 लाख लीटर, वाराणसी में 05 लाख लीटर तथा इटावा में 05 लाख लीटर दैनिक दुग्ध प्रसंस्करण क्षमता के डेरी प्लाण्टों की स्थापना का लक्ष्य है।
“ग्रामीण क्षेत्रों में दुग्ध विकास कार्यक्रमों हेतु अवस्थापना सुविधा” योजनान्तर्गत बल्क मिल्क कूलर एवं आटोमैटिक मिल्क कलेक्शन यूनिटों की स्थापना की जा रही है ।
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मत्स्य
हमारी सरकार द्वारा मत्स्य पालन व्यवसाय को कृषि का दर्जा दिये जाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है । इससे मत्स्य पालन में पँूजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा तथा जल संसाधनों के उपयोग, बीमा सुरक्षा, विपणन आदि में कृषि की भाँति प्रोत्साहन प्राप्त होगा ।
सक्रिय मत्स्य पालकों के आवास विहीन 1,600 परिवारों के लिये निःशुल्क आवास उपलब्ध कराये जाने की योजना के अन्तर्गत प्रति आवास हेतु राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता की राशि को 75,000 रुपये प्रति आवास से बढ़ाकर लोहिया आवास की भाँति 1 लाख 60 हजार रुपये कर दिया गया है।
सिंचाई
सिंचाई और बाढ़ की योजनाओं के लिये 7,587 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है।
लघु, मध्यम तथा मुख्य सिंचाई की कई नई योजनायें प्रस्तावित हैं जिनके लिये 1323 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है जिसमें बाढ़ नियंत्रण एवं जल निकासी की नयी योजनाओं के लिये 389 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
डाॅ0 राममनोहर लोहिया नवीन राजकीय नलकूप निर्माण परियोजना, डाॅ0 राममनोहर लोहिया राजकीय नलकूप आधुनिकीकरण परियोजना तथा डाॅ राम मनोहर लोहिया नलकूप पुनर्निर्माण योजना हेतु 356 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
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वाराणसी के तीन घाटों मालवीय घाट, राज नारायण घाट एवं लोहिया घाट के निर्माण हेतु 30 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
लघु सिंचाई
वर्तमान में प्रदेश का लगभग 77.98 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र लघु सिंचाई साधनों से सिंचित है ।
वर्ष 2014-2015 में लघु सिंचाई की विभिन्न योजनाओं के लियेे 338 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है, जिससे लगभग 1.98 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचन क्षमता का सृजन किये जाने का लक्ष्य है ।
सामुदायिक ब्लास्ट वेल के निर्माण हेतु 89 करोड़ रुपये, चेक डैमों के निर्माण के लिये 80 करोड़ रुपये तथा मध्यम गहरे नलकूपों के निर्माण हेतु 69 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
ऊर्जा
वर्तमान सरकार ने वर्ष 2012 में कार्यभार ग्रहण करने के पश्चात् विद्युत के क्षेत्र में प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने तथा प्रदेश की जनता को आवश्यकता के अनुसार विद्युत उपलब्ध कराने की दिशा में युद्ध स्तर पर कार्य किया है । प्रदेश में अभी भी विद्युत की मांग एवं आपूर्ति में लगभग 2,000 मेगावॅाट का अन्तर है । इस अन्तर को समाप्त करने तथा भविष्य में विद्युत की मांग में होने वाली वृद्धि के लिये आवश्यक विद्युत व्यवस्था हेतु अनेकों कदम उठाये गये हैं ।
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वर्ष 2016-2017 से ग्रामीण क्षेत्रों को 18 घण्टे तथा शहरी क्षेत्रों में 24 घण्टे बिजली उपलब्ध कराये जाने का निर्णय लिया गया है। इसके लिये आवश्यक पारेषण एवं वितरण लाइनों का निर्माण किया जायेगा । इन कार्यों पर लगभग 22,000 करोड़ रुपये का व्यय अनुमानित है ।
सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित की जा रही अनपरा ‘डी‘ तापीय परियोजना जिसकी क्षमता 1,000 मेगावाट है वर्ष 2014 में पूर्ण हो जायेगी तथा इससे विद्युत प्राप्त होने लगेगी ।
बारा, इलाहाबाद में स्थापित की जा रही 1,980 मेगावाट क्षमता की तापीय परियोजना भी लगभग पूर्ण है । इस परियेाजना की प्रथम इकाई से नवम्बर, 2014 तक तथा शेष 2 इकाईयों से जून, 2015 तक विद्युत उत्पादन प्रारम्भ हो जायेगा ।
ललितपुर में स्थापित की जा रही 1,980 मेगावाट क्षमता की परियोजना का कार्य भी दिसम्बर, 2014 तक पूर्ण हो जायेगा । परियेाजना की प्रथम इकाई से दिसम्बर, 2014 तक तथा दूसरी इकाई से जून, 2015 तक विद्युत उत्पादन प्रारम्भ हो जायेगा ।
एन0टी0पी0सी0 के साथ संयुक्त उपक्रम के अन्तर्गत स्थापित की जा रही 1,320 मेगावाट क्षमता की मेजा तापीय परियोजना से वर्ष 2016 में 916 मेगावाट बिजली प्रदेश को मिलने लगेगी ।
प्रदेश में गैर विद्युतीकृत लगभग 1,34,000 मजरों के विद्युतीकरण का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया है तथा इसके लिये 7,282 करोड़ रुपये की
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योजनायें स्वीकृत हो चुकी हैं । यह कार्य अगले 2 वर्ष में पूर्ण कर लिया जायेगा ।
ग्रामीण क्षेत्रों में निजी नलकूपों के ऊर्जीकरण के लिये किसानों को एक वर्ष से अधिक इन्तजार करना पड़ता है। योजना बनाई जा रही है कि पूर्व से लम्बित सभी नलकूपों का ऊर्जीकरण तत्काल कर दिया जाय एवं भविष्य में भी किसानों द्वारा आवेदन करने पर नलकूपों का ऊर्जीकरण बिना किसी विलम्ब के हो सके ।
अतिरिक्त ऊर्जा
हमारी सरकार ने चीनी उद्योग आसवनी एवं को-जेनरेशन प्रोत्साहन नीति, 2013 प्रख्यापित की जिसमें बगास से संचालित को-जेनरेशन इकाईयों की स्थापना पर विशेष बल दिया जा रहा है जिससे को-जेनरेशन संयंत्रों की वर्तमान स्थापित क्षमता को बढ़ाकर 1,500 मेगावाॅट किये जाने की योजना है।
प्रदेश में विद्युत उत्पादन एवं आपूर्ति के अन्तर के दृष्टिगत प्रदेश सरकार द्वारा सौर ऊर्जा नीति-2013 प्रख्यापित की गयी है । इस नीति के अनुसार मार्च 2017 तक 500 मेगावाट क्षमता की सौर ऊर्जा विद्युत उत्पादन परियोजनाओं की स्थापना का लक्ष्य है ।
व्यक्तिगत, संस्थागत तथा सरकारी भवनों में रूफटाॅप सोलर पाॅवर प्लाण्ट की स्थापना हेतु रूफटाॅप सोलर पाॅवर प्लाण्ट नीति 2014-2015 बनायी जा रही है ।
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सड़क एवं यातायात
प्रदेश में सड़कों, पुलों और सम्पर्क मार्गों के निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण हेतु 15,100 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
सड़कों के अनुरक्षण कार्यों के लिये 2,492 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
जिला मुख्यालयों को 04 लेन से मार्ग से जोड़ा जाना प्रदेश सरकार की प्राथमिकता का कार्यक्रम है । इसके अन्तर्गत 14 जिला मुख्यालयों को 04 लेन से जोड़ने हेतु मार्गो का निर्माण किया जाना है। अब तक 09 जनपदों हेतु कार्यों की स्वीकृति निर्गत करा दी गई है तथा मार्ग निर्माणाधीन हैं। वर्ष 2014-2015 में जिला मुख्यालयों को 04 लेन से जोड़े जाने हेतु 655 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित की गयी है।
वर्तमान में लगभग 2,100 किलोमीटर राज्य मार्ग सिंगल लेन के हैं, जिसमें से लगभग 1,550 किलोमीटर राज्य मार्गो के चैड़ीकरण/सुदृढ़ीकरण का कार्य प्रगति में है। वर्ष 2014-2015 में 100 किलोमीटर राज्य मार्गो को दो लेन चैड़ीकरण/सुदृढ़ीकरण किया जायेगा । राज्य राजमार्गो के चैड़ीकरण एवं सुदृढ़ीकरण हेतु 667 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
वित्तीय वर्ष 2014-2015 में प्रदेश में 500 से अधिक आबादी की समस्त अवशेष अनजुड़ी बसावटें, जो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के कोर नेटवर्क में सम्मिलित नहीं हैं, को पक्के सम्पर्क मार्गों से जोड़े जाने की योजना है ।
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ग्रामीण अंचलों में पुलों के निर्माण हेतु 1,084 करोड़ रुपये तथा रेलवे उपरिगामी सेतुओं के निर्माण हेतु 465 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
भारत-नेपाल सीमावर्ती जिलों में सड़कों के निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण हेतु 765 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
आवास एवं शहरी नियोजन
प्रदेश के शहरी क्षेत्रों के सन्तुलित, सुनियोजित एवं सुस्थिर विकास तथा समाज के समस्त वर्गों को उनकी आर्थिक क्षमतानुसार विकसित भूमि, आवास, रोजगार के अवसर एवं स्वच्छ पर्यावरण आदि उपलब्ध कराये जाने के उद््देश्य से ‘राज्य शहरी आवास एवं पर्यावास नीति-2014‘ निर्गत की गयी है ।
प्रदेश की तीव्र गति से बढ़ रही नगरीय जनसंख्या को ध्यान में रखते हुये ‘सबके लिए आवास योजना‘ के अन्तर्गत 52,000 आवासीय भवन एवं भूखण्ड उपलब्ध कराने का लक्ष्य है ।
लखनऊ विकास क्षेत्र एवं प्रदेश के समस्त विकास क्षेत्रों एवं नगर क्षेत्रों में अवस्थापना विकास हेतु 500 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
लखनऊ में जय प्रकाश नारायण अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र की स्थापना हेतु 100 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
नगरीय परिवहन परियोजना के अन्तर्गत गठित होने वाले डेडिकेटेड अरबन ट्रांसपोर्ट फण्ड की स्थापना हेतु 225 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है ।
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शहरी क्षेत्रों में अन्त्येष्टि स्थलों के विकास हेतु 100 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
आगरा पेयजलापूर्ति परियोजना हेतु वित्तीय वर्ष 2014-2015 में 300 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
जे0एन0एन0यू0आर0एम0 कार्यक्रम के यू0आई0जी0 (न्ण्प्ण्ळण्) एवं यू0आई0डी0एस0एस0 एम0टी0 (न्ण्प्ण्क्ण्ैण्ैण्डण्ज्ण्) कार्यांशों हेतु क्रमशः 800 करोड़ रुपये तथा 1,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
नदी प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम में अन्तर्गत प्रदेश की नदियों गंगा, यमुना तथा गोमती के तट पर स्थित नगरों में नदी प्रदूषण नियंत्रण के कार्यों की बजट व्यवस्था हेतु 83 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
‘झील संरक्षण योजना‘ हेतु 66 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास
प्रदेश में औद्योगिक एवं अवस्थापना विकास को गति प्रदान करने, वर्तमान योजनाओं का लाभ जन-जन तक सुलभ कराने और उद्यम स्थापना एवं क्रियान्वयन संबंधी समस्याओं के निराकरण हेतु अवस्थापना एवं औद्योगिक निवेश नीति-2012 लागू की गयी है ।
उ0प्र0 के सभी क्षेत्रों में सामान्य रूप से और विशेष रूप से पिछड़े क्षेत्रों में अवस्थापना सुविधाओं के विकास हेतु राज्य सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश अवस्थापना विकास कोष का गठन किया गया है ।
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सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा निर्यात प्रोत्साहन
प्रदेश सरकार की प्रोत्साहन नीति के फलस्वरूप, वर्ष 2013-2014 में 45,164 सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों की स्थापना हुई है, जिसमें लगभग 3,042 करोड़ रुपये का पूँजी निवेश हुआ तथा लगभग 4,81,000 व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध हुआ ।
लघु उद्योग एवं निर्यात प्रोत्साहन की नयी योजनाओं के लिये लगभग 73 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है ।
हथकरघा वस्त्रोद्योग
वाराणसी और आगरा में बुनकर बाजारों की स्थापना के लिये 15 करोड़ रुपये की नयी योजना प्रस्तावित है ।
सरकार द्वारा बुनकरों के स्वास्थ्य के लिये आई0सी0आई0सी0आई0 (प्ण्ब्ण्प्ण्ब्ण्प्ण्) लोम्बार्ड बीमा कम्पनी के माध्यम से प्रदेश में स्वास्थ्य बीमा योजना चलाई जा रही है ।
खादी एवं ग्रामोद्योग
प्रत्येक न्याय पंचायत में एक खादी ग्रामोद्योग इकाई की स्थापना करने के उददेश्य से वर्ष 2014-2015 में 375 करोड़ रुपये संस्थागत पूॅंजीनिवेश से 7,500 इकाईयों की स्थापना का लक्ष्य है ।
इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जाति के लाभार्थियों के लिए 425 इकाईयों की स्थापना का
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लक्ष्य है, जिससे 10,200 लाभार्थियों को स्वरोजगार के अवसर सुलभ होंगे ।
सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्राॅनिक्स
प्रदेश में आई0टी0 (प्ण्ज्ण्)/आई0टी0ई0एस0 (प्ण्ज्ण्म्ण्ैण्) उद्योगों की स्थापना एवं विकास के दृष्टिगत सरकार द्वारा आई0टी0 नीति 2012 घोषित की गयी है। आई0टी0 नीति 2012 में दिये गये प्रावधानों के अनुरूप सर्वप्रथम लखनऊ में आई0टी0 सिटी की स्थापना की जा रही है । इसी के अनुरूप आगरा में भी आई0टी0 सिटी की स्थापना किया जाना प्रस्तावित है ।
आई0टी0 सिटी के अतिरिक्त प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर आई0टी0 पाक्र्स स्थापित किये जाने की कार्यवाही गतिमान है ।
समाज कल्याण
छात्रवृत्ति वितरण में पारदर्शिता एवं समयशीलता लाने हेतु छात्रवृत्ति योजना का पूर्ण कम्प्यूटरीकरण किया गया है । वित्तीय वर्ष 2014-2015 में अनुसूचित जाति के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति के लिये 2,073 करोड़ रुपये तथा सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति के लिये 722 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
आश्रम पद्यति विद्यालयों के लिये 135 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
सरकार प्रदेश के पूर्व सैनिकों, शहीद सैनिकों की पत्नियों एवं उनके आश्रितों के कल्याण एवं
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पुनर्वास की योजनाओं के लिये 30 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
पिछड़ा वर्ग कल्याण
पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राओं की छात्रवृत्ति योजनाओं के लिये वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट में 1,096 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राओं के लिये छात्रावास निर्माण हेतु 24 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
अल्पसंख्यक कल्याण
अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र/छात्राओं को छात्रवृत्ति योजनाओं के लिये 919 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
अरबी-फारसी मदरसा आधुनिकीकरण योजना के लिये 240 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है।
अरबी पाठशालाओं के लिये 316 करोड रुपये के अनुदान की व्यवस्था प्रस्तावित है।
अल्पसंख्यक समुदाय के कब्रिस्तान/अन्त्येष्टि स्थल की चहारदीवारी के निर्माण के लिये 200 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है।
विकलांग कल्याण
प्रदेश के विभिन्न जनोपयोगी सार्वजनिक कार्यालय/भवनों में विकलांग जन के सुगम आवागमन/आसान पहुँच हेतु सुविधा प्रदान करने
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की दृष्टि से सिपडा योजना हेतु रुपये 25 करोड़ की धनराशि प्रस्तावित की गयी है ।
तीन समेकित विशेष माध्यमिक विद्यालयों के भवन निर्माण हेतु प्रति विद्यालय 5 करोड़ रुपये की दर से 15 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
महिला एवं बाल कल्याण
राजीव गांधी किशोरी बालिका सशक्तिकरण योजना “सबला” के लिये 320 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
अनुपूरक पोषाहार योजना के लिये 3,344 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
समन्वित बाल विकास योजना के अन्तर्गत मेडिसिन किट्स, वेतन, मानदेय आदि पर व्यय हेतु 1,618 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
बेसिक शिक्षा
प्राथमिक शिक्षा हेतु 2014-2015 के बजट में 29,380 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
इसमें सर्वशिक्षा अभियान हेतु 7,715 करोड़ रुपये की व्यवस्था तथा प्राथमिक विद्यालयों में मध्याह्न भोजन कार्यक्रम हेतु 1,685 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत मानक के अनुसार असेवित बस्तियों में विद्यालयों की स्थापना का संतृप्तीकरण लगभग पूर्ण हो गया है । ऐसी असेवित बस्तियाॅं जो किन्हीं कारणों से छूट गयी हैं, उनमें नवीन प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय
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की स्थापना का लक्ष्य है । इसके अतिरिक्त पूर्व से संचालित विद्यालयों में बच्चों के बैठने हेतु समुचित व्यवस्था के लिये लगभग 6,475 अतिरिक्त कक्षा-कक्षों का निर्माण भी प्रस्तावित है ।
वित्तीय वर्ष 2013-2014 में कक्षा 1-8 तक के लगभग समस्त छात्र-छात्राओं को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें एवं यूनीफार्म उपलब्ध करायी गयी । वित्तीय वर्ष 2014-2015 में समस्त छात्र-छात्राओं को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें तथा यूनीफार्म के दो सेट दिया जाना प्रस्तावित है ।
माध्यमिक शिक्षा
माध्यमिक शिक्षा की योजनाओं के लिये 7,880 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
प्रदेश में माध्यमिक शिक्षा के स्तर को सुधारने तथा सुदूर क्षेत्रों में भी शिक्षा के विकास हेतु राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान का क्रियान्वयन किया जा रहा है जिसके अन्तर्गत प्रत्येक 5 किलोमीटर की परिधि में हाईस्कूल की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है,जिसकी पूर्ति के लिये लगभग 3,375 नये माध्यमिक विद्यालयों की आवश्यकता होगी।
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के लिये 200 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के छात्रावास निर्माण हेतु 200 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था का प्रस्ताव है ।
प्रदेश में तीन नये सैनिक स्कूलों की स्थापना के लिये 6 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
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ई-बुक्स का क्रय/ई-लाइब्रेरी की स्थापना हेतु 2.50 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था की गई है।
उच्च शिक्षा
उच्च शिक्षा हेतु 2,269 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था का प्रस्ताव है ।
प्रदेश में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के उद््देश्य से अराजकीय महाविद्यालयों को अनुदान दिये जाने हेतु 1,534 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के अंतर्गत माॅडल डिग्री काॅलेजों की स्थापना के लिये 142 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, सिद्धार्थनगर तथा इलाहाबाद में राज्य विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु क्रमशः 20 करोड़ रुपये एवं 10 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।
ई-बुक्स का क्रय/ई-लाइब्रेरी की स्थापना हेतु 2.50 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था की गई है।
प्राविधिक शिक्षा
प्रदेश में वर्तमान में 110 सरकारी पाॅलीटेक्निक और 306 निजी पाॅटीटेक्निक संचालित हैं । सत्र 2014-2015 से 08 और नवीन राजकीय पाॅलीटेक्निक संस्थाओं में प्रशिक्षण प्रदान किया जाना प्रस्तावित है।
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वर्ष 2013-2014 में डिग्री स्तर के 02 तकनीकी विश्वविद्यालय को संविलीन कर उसे पूर्ववत उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय के नाम से स्थापित किया गया है एवं मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज, गोरखपुर को विश्वविद्यालय बनाया गया है।
प्रत्येक मण्डल में एक राजकीय इंजीनियरिंग कालेज स्थापित किया जाना राज्य सरकार की प्राथमिकता में शामिल है जिसके अन्तर्गत जनपद सोनभद्र, कन्नौज एवं मैनपुरी में एक-एक इंजीनियरिंग कालेज स्थापित किया जा रहा है तथा बरेली मण्डल के जनपद बदायँू में भी एक राजकीय इंजीनियिरिंग कालेज की स्थापना का निर्णय लिया गया है।
व्यावसायिक शिक्षा
वर्तमान में प्रदेश में 217 राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित हंै, जिनकी प्रशिक्षण क्षमता 69,014 है ।
16 राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान विश्व बैंक फण्डिंग के अन्तर्गत तथा 115 राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पी0पी0पी0) येाजना के अन्तर्गत उच्चीकृत किये जा रहे हैं ।
वित्तीय वर्ष 2014-2015 में प्रमुख रूप से प्रदेश की असेवित तहसीलों/विकास खण्डों में 20 नये राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना किये जाने का लक्ष्य है ।
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चिकित्सा शिक्षा
चिकित्सा शिक्षा हेतु 2,513 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
लखनऊ जनपद में उच्चस्तरीय सुपर स्पेशिलिटी कैंसर संस्थान के लिये 68 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
डाॅ0 राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट आॅफ साइंसेज के संचालन हेतु 184 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
किंग जाॅर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय लखनऊ को विकसित किये जाने हेतु 400 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ की रोगी सेवाओं का विस्तारण करते हुये गत वर्ष इमरजेंसी मेडिसिन विभाग तथा आप्थलमिक सेण्टर की स्थापना करने का निर्णय लिया गया । इस संस्थान के संचालन एवं निर्माण कार्यों हेतु 368 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
मेडिकल काॅलेज, गोरखपुर में मस्तिष्क ज्वर की महामारी के रोकथाम हेतु 500 शैय्या वाले बाल रोग चिकित्सा संस्थान की स्थापना हेतु 68 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
मेडिकल काॅलेज, झाँसी के सुदृढ़ीकरण, अधूरे निर्माण कार्यों को पूरा करने, आवश्यक उपकरणों की स्थापना एवं उच्चस्तरीय चिकित्सालय की स्थापना हेतु 60 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
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मेडिकल काॅलेज, आजमगढ़ के संचालन हेतु 42 करोड़ रुपये एवं मेडिकल काॅलेज, बाँदा में इसी वर्ष बाह्य रोग तथा अन्तः रोगी विभागों को संचालित किए जाने हेतु 71 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
जनपद गौतमबुद्धनगर में सुपर स्पेशिलिटी बाल चिकित्सालय एवं पोस्ट ग्रेजुएट शैक्षणिक संस्थान, नोएडा तथा चिकित्सा विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा की स्थापना प्रस्तावित है ।
जनपद चन्दौली में एक और मेडिकल काॅलेज स्थापित किया जाना प्रस्तावित है । जनपद जौनपुर तथा बदायूँ में मेडिकल काॅलेज की स्थापना की कार्यवाही गतिमान है ।
चिकित्सा,स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की योजनाओं के लिये 12,192 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के कार्यान्वयन के लिये 3,867 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
वर्ष 2011 की जनगणना को आधार मानते हुये प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के निर्माण/स्थापना की नीति निर्धारित की गयी है जिसके अन्तर्गत हर 30,000 की आबादी पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं 1 लाख की आबादी पर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करने का मानक है । इसके अन्तर्गत 729 नये सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं 1681 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के
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निर्माण/स्थापना का लक्ष्य है जिसे आगामी 03 वर्षो में पूर्ण किया जायेगा।
मातृ मृत्यु दर वर्ष 2010-2011 में 345 प्रति लाख जीवित जन्म से घटकर वर्तमान में 300 प्रति लाख जीवित जन्म हो गई है।
मातृ मृत्यु दर में कमी लाने के लिये मुख्य रूप से जननी सुरक्षा योजना तथा जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । गर्भवती महिलाओं को घर से चिकित्सा इकाई तक एवं प्रसवोपरान्त चिकित्सा इकाई से घर तक पहँुचाने हेतु निःशुल्क परिवहन सुविधा 102 एम्बुलेन्स सेवा 2013-2014 से प्रारम्भ की गई है।
रोगियों को सुचारू एवं निरन्तर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराये जाने हेतु 24 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति हेतु प्रदेश के 112 राजकीय चिकित्सालयों में स्वतंत्र विद्युत फीडर की स्थापना करायी जा चुकी है।
प्रदेश में 108 ई0एम0टी0एस0 (म्ण्डण्ज्ण्ैण्) समाजवादी स्वास्थ्य सेवा के संचालन हेतु 77 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
राष्ट्रीय एड्स एवं एस0टी0डी0 नियंत्रण कार्यक्रम हेतु लगभग 89 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था का प्रस्ताव है ।
जिला संयुक्त चिकित्सालयों में विशिष्ट चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराये जाने हेतु मशीने एवं उपकरण और संयंत्रों के क्रय के लिये 144 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
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प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के भवनों के निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण हेतु 50 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है । सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के निर्माण कार्यों तथा उपकरणों के क्रय हेतु 159 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
आयुर्वेदिक एवं यूनानी काॅलेजों तथा चिकित्सालयों के निर्माण कार्यों एवं उपकरणों के क्रय हेतु 25 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था का प्रस्ताव है ।
कारागार प्रशासन एवं सुधार
वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट में जिला कारागार, रामपुर के लिये 20 करोड़ रुपये तथा जिला कारागार इटावा के निर्माण हेतु 20 करोड़ रुपये तथा जिला कारागार, मुरादाबाद के लिये 20 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है । जिला कारागारों के उच्चीकरण, नवीनीकरण और चालू कार्यों के लिए 140 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
वन
उत्तर प्रदेश विभिन्न प्रकार के वनों, वन्य जीवों एवं जैव विविधता से परिपूर्ण प्रदेश है । इनके संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु हमारी सरकार सतत् प्रयत्नशील व तत्पर है ।
प्रदेश में वर्ष 2013-2014 में लगभग 6 करोड़ से अधिक पौधों का रोपण किया गया ।
प्रदेश के प्रत्येक जनपद में वर्ष 2013-2014 में हरित पट््टी (ग्रीन बेल्ट) का विकास किया गया है । इस ग्रीन बेल्ट वृक्षारोपण में कुल 607 स्थलों
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पर 2951 हेक्टेयर क्षेत्र में 18 लाख पौधों का रोपण किया गया ।
मैनपुरी में समान पक्षी विहार परियोजना हेतु भूमि की व्यवस्था के लिये 25 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान प्रस्तावित है ।
मैनपुरी, इटावा, लखनऊ, उन्नाव, कन्नौज व बदायूँ को पूर्ण रूप से हराभरा किये जाने हेतु “टोटल फाॅरेस्ट कवर योजना” के लिये 20 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
पर्यावरण
पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम के अन्तर्गत पर्यावरण की दृष्टि से अपघटित क्षेत्रों का इकोलाॅजिकल (म्बवसवहपबंस) विकास, प्रदूषण नियंत्रण और अपशिष्ट प्रबन्धन इत्यादि की समस्याओं से संबंधित व्यवहारिक क्षेत्रों में शोध को प्रोत्साहन दिया जायेगा।
उद्योगों को पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण हेतु प्रोत्साहित करने के उद््देश्य से इण्डस्ट्री स्पेसिफिक डाक्यूमेण्ट (प्दकनेजतल ैचमबपपिब क्वबनउमदज) तैयार कराया जायेगा।
नदियोें एवं झीलों में हो रहे प्रदूषण की रोकथाम के उद््देश्य से प्रदूषणकारी स्रोतों की पहचान हेतु रिमोट सेन्सिंग आधारित अध्ययन प्रस्तावित हैं ।
खेल एवं युवा कल्याण
प्रदेश में खेल अवस्थापना सुविधाओं के विकास हेतु 128 करोड़ रुपये की तथा स्पोट्र्स कालेजों को अनुदान, स्टेडियम के अनुरक्षण,
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प्रशिक्षण एवं खिलाडि़यों को पुरस्कार योजनाओं हेतु 38 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
प्रदेश में एक खेल एवं शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु 20 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
पंचायत युवा क्रीड़ा और खेल अभियान योजना हेतु 115 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
संस्कृति
प्रदेश में कला एवं संस्कृति के प्रदर्शन हेतु खुले मंच, चित्रकूट में प्रेक्षागृह, आजमगढ़ में हरिऔध कला केन्द्र, इलाहाबाद में जनेश्वर मिश्र पुस्तकालय की स्थापना, मथुरा-वृृन्दावन के मध्य आॅडिटोरियम का निर्माण, भारत रत्न बिस्मिल्ला खाँ की स्मृति में संग्रहालय एवं मकबरा स्थल के विकास की योजनायें प्रस्तावित हैं ।
पर्यटन
प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये कई नयी योजनायें बजट में प्रस्तावित हैं जिनके लिये 64 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है । इनमें उत्तर प्रदेश ट्रवेल मार्ट, 2014 प्रदेश के ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थलों का पर्यटन हेतु विकास तथा अन्य कई पर्यटन स्थलों का विकास सम्मिलित हैं ।
पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रदेश के अन्दर निजी वायुसेवा में तीन सीटों को अन्डरराइट करने हेतु बजट में 5 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है।
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न्याय
माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ बंेच, लखनऊ के गोमतीनगर में निर्माणाधीन नवीन भवन का निर्माण कार्य प्रगति पर है । इसका निर्माण कार्य वर्ष 2015 के अन्त तक पूर्ण किये जाने का लक्ष्य है । वित्तीय वर्ष 2014-2015 में इस कार्य के लिये 370 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
अनावासीय भवनों के निर्माण हेतु 200 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
न्यायिक अधिकारियों के आवासीय भवनों के निर्माण हेतु 100 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
प्रदेश के नवसृजित जनपदों में न्यायालय भवनों के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण हेतु वित्तीय वर्ष 2014-15 में रुपये 30 करोड़ की धनराशि की व्यवस्था प्रस्तावित है ।
भ्रष्टाचार सम्बन्धी मामलों की सुनवाई हेतु प्रदेश में 22 नये न्यायालयों की स्थापना की गयी है ।
लम्बित वादों के निस्तारण हेतु 31-03-2015 तक के लिए इवनिंग कोटर्स चलाये जाने हेतु वित्तीय वर्ष 2014-2015 में 68 करोड़ रुपये की बजट व्यवस्था प्रस्तावित है ।
राजकोषीय सेवायें
वाणिज्य कर
वाणिज्य कर प्रदेश के कर राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है । वाणिज्य कर विभाग का वर्ष
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2014-2015 का राजस्व संग्रह लक्ष्य शासन द्वारा रुपये 47,500 करोड़ निर्धारित किया गया है जो 2013-2014 की तुलना में 13 प्रतिशत अधिक है।
आबकारी शुल्क
वित्तीय वर्ष 2014-2015 हेतु 14500 करोड़ रुपये की प्राप्तियों का लक्ष्य प्रस्तावित है, जो वित्तीय वर्ष 2013-2014 की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक है ।
स्टाम्प एवं पंजीकरण
वित्तीय वर्ष 2014-2015 हेतु प्राप्तियों का लक्ष्य 12,723 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है जो वित्तीय वर्ष 2013-2014 की तुलना में 26 प्रतिशत अधिक है ।
वाहन कर
वित्तीय वर्ष 2014-2015 हेतु प्राप्तियों का लक्ष्य 3950 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है जो वित्तीय वर्ष 2013-2014 की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक है ।
वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट अनुमान
मान्यवर,
अब मैं वित्तीय वर्ष 2014-2015 के बजट अनुमानों के बारे में प्रमुख बिन्दुओं का उल्लेख करना चाहँूगा ।
प्राप्तियाँ
 वर्ष 2014-2015 में दो लाख सत्तर हजार पाँच सौ तिहत्तर करोड़ रुपये
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(2,70,573 करोड़ रुपये) की कुल प्राप्तियाँ अनुमानित हैं ।
 कुल प्राप्तियों में दो लाख छब्बीस हजार चार सौ उन्नीस करोड़ रुपये (2,26,419 करोड़ रुपये) की राजस्व प्राप्तियाँ तथा चैवालिस हजार एक सौ चैवन करोड़ रुपये (44,154 करोड़ रुपये) की पँूजीगत प्राप्तियाँ सम्मिलित हैं ।
 वर्ष 2014-2015 में राजस्व प्राप्तियों में कर राजस्व का अंश एक लाख सत्तावन हजार पाँच सौ दो करोड़ रुपये (1,57,502 करोड़ रुपये) है । इसमें केन्द्रीय करों में राज्य का अंश छिहत्तर हजार पाँच सौ दो करोड़ रुपये (76,502 करोड़ रुपये) सम्मिलित है ।
व्यय
 वर्ष 2014-2015 में कुल व्यय दो लाख चैहत्तर हजार सात सौ पाँच करोड़ रुपये (2,74,705 करोड़ रुपये) अनुमानित है ।
 कुल व्यय में एक लाख सत्तानवे हजार चार सौ पच्चीस करोड़ रुपये (1,97,425 करोड़ रुपये) राजस्व लेखे का व्यय है तथा सतहत्तर हजार दो सौ अस्सी करोड़ रुपये (77,280 करोड़ रुपये) पँूजी लेखे का व्यय है, जिसमें पूंजीगत परिव्यय पचपन हजार नौ सौ छियासी करोड़ रुपये (55,986 करोड़ रुपये) है ।
 वर्ष 2014-2015 के बजट में पचानवे हजार उन्तालिस करोड़ रुपये (95,039 करोड़ रुपये) आयोजनागत व्यय अनुमानित है ।
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राजस्व बचत
वर्ष 2014-2015 में अट्ठाईस हजार नौ सौ चैरानवे करोड़ रुपये (28,994 करोड़ रुपये) की राजस्व बचत अनुमानित है ।
राजकोषीय घाटा
वित्तीय वर्ष 2014-2015 में अट्ठाईस हजार चार सौ ग्यारह करोड़ रुपये (28,411 करोड़ रुपये) का राजकोषीय घाटा अनुमानित है जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 2.97 प्रतिशत है ।
समेकित निधि
समेकित निधि की प्राप्तियों से कुल व्यय घटाने के पश्चात् वर्ष 2014-2015 में घाटा चार हजार एक सौ बत्तीस करोड़ रुपये (4,132 करोड़ रुपये) अनुमानित है ।
लोक लेखे से समायोजन
वर्ष 2014-2015 में लोक लेखे से चार हजार पाँच सौ सत्तर करोड़ रुपये (4,570़ करोड़ रुपये) की शुद्ध प्राप्तियाँ अनुमानित हैं ।
समस्त लेन-देन का शुद्ध परिणाम
वर्ष 2014-2015 में समस्त लेन-देन का शुद्ध परिणाम चार सौ अड़तीस करोड़ रुपये (438 करोड़ रुपये) अनुमानित है ।
अन्तिम शेष
वर्ष 2014-2015 में प्रारम्भिक शेष चार हजार पाँच सौ नब्वे करोड़ रुपये (4,590 करोड़ रुपये) को हिसाब में लेते हुये अन्तिम शेष पाँच हजार
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अट्ठाईस करोड़ रुपये (5,028 करोड़ रुपये) होना अनुमानित है ।
मान्यवर,
मैं मंत्रि-परिषद के अपने सभी माननीय सदस्यों का अत्यन्त आभारी हँू कि उनके सहयोग एवं परामर्श से तथा सभी विभागों में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों की सहायता से बजट प्रस्तुत करने में सक्षम हो सका हँू । मैं प्रमुख सचिव, वित्त और वित्त विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के प्रति अपना आभार प्रकट करता हँू, जिन्होंने इस बजट को तैयार करने में बहुमूल्य सहायता प्रदान की है । मैं, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र, लखनऊ के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रति भी इस हेतु आभार प्रकट करता हँू । राजकीय मुद्रणालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी मैं धन्यवाद ज्ञापन करता हँू कि उन्होंने बजट साहित्य का मुद्रण समय से किया । महालेखाकार, उत्तर प्रदेश एवं उनके अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रति भी मैं उनके द्वारा दिये गये सहयोग के लिये अपना आभार प्रकट करता हँू ।
इस बजट के माध्यम से हमारा प्रयास है कि प्रदेश के किसान, युवा वर्ग, बेरोजगार, बालिकायें एवं महिलायें, अल्पसंख्यक, विपन्न, असहाय, कमजोर और पिछड़े वर्गों के लोग भी जीवन और भविष्य के प्रति आशान्वित हो सकें और एक नई ऊर्जा के
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साथ स्वयं तथा समाज की उन्नति के लिये कृतसंकल्प होकर विकास के एक नये युग का सृजन कर सकें । मैं प्रदेश के हर वर्ग/समुदाय का आह्वान करता हँू कि आइये हम सब मिलकर उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने के संकल्प को साकार करें ।
इन शब्दों के साथ, मान्यवर, मैं विनम्रतापूर्वक वित्तीय वर्ष 2014-2015 का प्रदेश का बजट प्रस्तुत करता हँू ।
ज्येष्ठ 30, शक संवत् 1936
तदनुसार,
दिनाँक: 20 जून, 2014

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

यह अमीरों का बजट है,जनता का नहीं

मोदी की पांच साल चलने वाली सरकार का पहला बजट सामने आ गया. जब रेल के किराये में 14.20 प्रतिशत की वृद्धि बजट का इंतज़ार किए बिना की गई थी, तब हमें लगा था कि शायद बजट इससे भिन्न होगा, लेकिन जैसे ही यह तर्क आया कि यह वृद्धि हमने नहीं की है, यह तो पिछली मनमोहन सिंह सरकार की प्रस्तावित वृद्धि थी, जिसे हमने लागू कर दिया, तो लगा कि नरेंद्र मोदी की सरकार भी देश को उसी तरह बातों के जाल में उलझाने की कोशिश कर रही है, जिस तरह पिछली सरकार कर रही थी. कहानियां कई तरह की फैलाई गईं कि रेलवे की हालत खराब है, रेलवे बंद हो जाएगा, इसलिए किराया बढ़ाना मजबूरी थी. जब भी पिछली सरकार में किराया बढ़ाने की बात होती थी, तो भारतीय जनता पार्टी छाती पीट-पीट कर सियापा करती थी और कहती थी कि यूपीए सरकार के पास न कोई योजना है, न कोई काम करने का सलीका है और न कोई भविष्य की दृष्टि. वह स़िर्फ फौरी तौर पर उपाय करना चाहती है. और, जब रेल के किराये में वृद्धि के समय मोदी सरकार ने उन्हीं तर्कों का सहारा लिया, जिनका सहारा पिछली सरकारें लेती रही हैं, तब भी हमने इस आशंका को सही नहीं माना.
लेकिन जब रेल बजट आया, तब हमें लगा कि हमारी आशंकाएं गलत नहीं थीं. नरेंद्र मोदी को छह महीने काम करने का मौक़ा देकर सरकार को पूरी आज़ादी रहनी चाहिए, लेकिन इसी बीच नरेंद्र मोदी ने एक बयान जारी किया कि हमें सौ दिन का हनीमून का समय भी लोग क्यों नहीं दे रहे हैं. इससे हमें लगा कि नरेंद्र मोदी किसी कशमकश में फंसे हैं और यह कशमकश सबसे पहले रेल बजट में सामने आई. इस देश में जो लोग रेल पर चढ़ते हैं, उनमें स़िर्फ मुश्किल से पांच प्रतिशत लोग लंबी दूरी की यात्रा करते हैं, एयर कंडीशन में बैठते हैं और उन सुविधाओं में सुधार चाहते हैं, जो उन्हें पसंद नहीं आतीं. लेकिन बाकी 95 प्रतिशत लोग उन टे्रेनों में यात्रा करते हैं, जिनमें पानी नहीं होता, जिनमें गंदगी की भरभार है और जो 200 से 400 किलोमीटर की दूरी के बीच में चलती हैं. नरेंद्र मोदी का रेल बजट पांच प्रतिशत यात्रियों की सुविधाओं का रेल बजट था. जितनी ट्रेनों की शुरुआत हुई, वे इन्हीं पांच प्रतिशत लोगों के लिए हैं. लेकिन, 95 प्रतिशत लोग किसी भी तरह की सुविधा से, रेल परिवहन में किसी भी प्रकार के सुधार के दायरे से बाहर रहे. तब भी हमें लगा कि शायद जब देश का आर्थिक मसौदा यानी बजट सामने आएगा, तब यह स्थिति बदल जाएगी. पर अब देश के सामने मोदी सरकार का बजट आ गया है और इस बजट के प्रावधान आ गए हैं.
90 फ़ीसद लोग बजट से बाहर
मोदी के इस बजट के आंकड़ों के ऊपर हम इसलिए बात नहीं करेंगे क्योंकि वे लोगों की ज़िंदगी से जुड़े हुए हैं और लोग उनकी गर्मी या नमी अपनी ज़िंदगी में महसूूस करेंगे. लेकिन, हम उसके उस पहलू का जिक्र करेंगे, जो नरेंद्र मोदी सरकार को दिखाई नहीं दे रहा है. और अगर दिखाई दे रहा है, तो इसका मतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार देश को जानबूझ कर उसी रास्ते पर ले जाना चाह रही है, जिस पर चलकर हम त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और ज़िंदगी में आशा की किरण देखना चाहते हैं. अच्छे दिन सचमुच आ गए, लेकिन अच्छे दिन किसके लिए आ गए? यहां पर अगर हम देश या लोगों की बात करते हैं, तो देश दो भागों में बंटा हुआ है. एक तरफ़ 90 प्रतिशत लोग हैं और दूसरी तरफ़ 10 प्रतिशत. ये 10 प्रतिशत लोग पूंजी बाज़ार में रहते हैं, ये 10 प्रतिशत लोग मॉल में जाते हैं, एयर कंडीशन ट्रेनों में सफर करते हैं, हवाई जहाज में सफर करते हैं और सड़कों पर चमचमाती बड़ी गाड़ियां इन्हीं 10 प्रतिशत लोगों की होती हैं. यह बजट इन्हीं 10 प्रतिशत लोगों का बजट है. इसके दायरे से 90 प्रतिशत लोग बाहर हैं. अगर हम देश में रहने वाली संपूर्ण आबादी को एक इकाई मानें, तो उस इकाई का 90 प्रतिशत इस बजट से बाहर है.
नरेंद्र मोदी के लिए यह याद रखना ज़रूरी है कि उनकी सरकार इन 10 प्रतिशत लोगों के वोट से नहीं आई, क्योंकि इन 10 प्रतिशत लोगों ने मोदी के लिए ज़ुबान चलाने से ज़्यादा कुछ नहीं किया. वोट देने तो ये गए ही नहीं. नरेंद्र मोदी की पार्टी को जो 30 या 32 प्रतिशत वोट मिले, वे उन 90 प्रतिशत लोगों के थे, जिन्हें पिछली सरकारों से निराशा हाथ लगी थी. नरेंद्र मोदी के भाषणों में दिलाई गई आशा ने उन्हें नरेंद्र मोदी को वोट देने के लिए प्रेरित किया. उन 90 प्रतिशत लोगों के लिए बजट में क्या है? मेरे सामने पूरा बजट खुला हुआ पड़ा है और वे 90 प्रतिशत लोग इसमें कहीं नहीं हैं. जिन युवाओं को नरेंद्र मोदी ने सपना दिखाया था, वे इस बजट में कहीं नहीं हैं. जो अशिक्षित हैं, उनके लिए शिक्षा प्राप्त करने का कोई रास्ता इस बजट में नहीं है. जो बेरोज़गार हैं, उनके लिए रोज़गार पाने का कोई दरवाजा इस बजट में नहीं है और यह बजट कहीं से भी भ्रष्टाचार एवं महंगाई से लड़ता हुआ दिखाई नहीं देता.
विदेशी निवेश को लूट की छूट
आज नरेंद्र मोदी की शान में अख़बारों एवं टेलीविजन पर कसीदे पढ़े जा रहे हैं, पर अख़बार एवं टेलीविजन भी अब 10 प्रतिशत लोगों के लिए हो गए हैं, जिनकी ख़बरें वे दिखाते हैं, जिनकी ज़िंदगी के सपने वे दिखाते हैं और उन सपनों में बहकर इस देश के 90 प्रतिशत लोग अपना वोट दे देते हैं. इस बजट का पहला महत्वपूर्ण हिस्सा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है. इस सरकार ने अपना रोल कम करना प्रारंभ कर दिया है और विदेशी पूंजी निवेश लगभग हर क्षेत्र में खोल दिया है. इसका दूसरा मतलब है कि हमारे देश की सारी सरकारी कंपनियों में अब विदेशी कंपनियों का नियंत्रण भी बढ़ेगा, हस्तक्षेप भी बढ़ेगा और हमारे देश का पैसा बाहर जाने के रास्ते तलाशने लगेगा. सीधे 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए राह खोल देने पर लगभग पूर्ण रूप से सारी उत्पादन इकाइयों और पूंजी को संभालने में लगी संस्थाओं का नियंत्रण विदेशी कंपनियों के हाथ में देना होगा. विदेशी कंपनियां पहले विदेशों में नागरिकता लिए हुए भारतीयों के माध्यम से हमारे देश में हस्तक्षेप करती थीं. अब उन्हें इसके लिए उस परदे की भी ज़रूरत नहीं है. वे सीधे हमारे देश के पूंजी बाज़ार और हमारी अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में लेने के लिए पहला क़दम बढ़ा देंगी.
हमारे देश के बैंक राष्ट्रीयकरण से पहले हिंदुस्तान के चौदह बड़े घरानों के लिए काम करते थे. स्वर्गीय इंदिरा गंधी ने इनका राष्ट्रीयकरण इसलिए किया था, ताकि ये इस देश के ग़रीबों के आर्थिक विकास में अपना महत्वपूर्ण रोल निभा सकें, लेकिन बाद की सरकारों के रवैये ने बैंकों को फिर से पूंजीपतियों या बड़े पैसे वालों या कॉरपोरेट के लिए काम करने वाले हथियार के रूप में बदल दिया. नतीजे के तौर पर जितने भी बड़े उद्योग हैं या बड़े कॉरपोरेट हैं, वे बैंकों का खुला इस्तेमाल अपने लिए करते हैं और बैंकों का पैसा भी नहीं लौटाते और बैंक उन्हें आसानी से राइट ऑफ कर देते हैं, लेकिन इस देश के 90 प्रतिशत लोगों, जिनमें किसान भी शामिल हैं, को दिए गए पैसे की वसूली बड़ी बेरहमी के साथ होती है. जहां एक तरफ़ बड़े उद्योगों और बड़े कॉरपोरेट को दिया गया पैसा बट्टे खाते में डाला जाता है, वहीं इन ग़रीबों को पैसा न देने की एवज में जेल में डाल दिया जाता है. अब इन बैंकों में विदेशी एवं देशी पूंजीपतियों को शेयर खरीदने के दरवाजे खोलकर इन्हें फिर से उनके नियंत्रण में देने की योजना मोदी सरकार ने शुरू कर दी है.
नरेंद्र मोदी ने सौ शहरों की योजना, जिन्हें उन्होंने स्मार्ट शहर का नाम दिया है, अपने चुनाव अभियान के दौरान कही थी. उनका कहना है कि दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता एवं लखनऊ जैसे शहरों पर बढ़ रहा बोझ ये स्मार्ट शहर, जिनमें सारी सुविधाएं होंगी, जिन्हें वे विकसित करेंगे, बांटेंगे. सवाल यह है कि ये सौ शहर किसकी ज़मीन पर बनेंगे, इनके लिए कितनी ज़मीन की ज़रूरत होगी और कितने किसान विस्थापित होंगे? ये स्मार्ट शहर जहां बनाए जाएंगे, वहां की सारी की सारी उपजाऊ ज़मीन अधिग्रहीत किए बिना ऐसा संभव नहीं होगा. इसका मतलब यह कि उपजाऊ ज़मीनें किसानों से छीनी जाएंगी और सौ शहरों के नाम पर पूंजीपतियों या बड़े बिल्डर्स को दे दी जाएंगी, जो एक तरफ़ शहर का निर्माण करेंगे और दूसरी तरफ़ शहर के आसपास की ज़मीन को एक ऐसी संपत्ति बनाएंगे, जिसे भविष्य में महंगे दामों पर देश के लोगों को बेचा जा सके.
इन शहरों के निर्माण में विदेशी सरकारों का सहयोग लिया जाएगा और विदेशी कंपनियों के हाथों में इन शहरों की संपूर्ण संपत्ति सौंपकर एक दीर्घकालिक समझौता किया जाएगा, ताकि हमारे देश का, किसानों से छीना हुआ ज़मीन के रूप में महत्वपूर्ण अर्थस्रोत विदेशी कंपनियों के पास चला जाए. मौजूदा बजट का सबसे ज़्यादा जोर रियल स्टेट पर है. सरकार का कहना है कि रियल स्टेट में रोज़गार के अवसर बढ़ते हैं. हम जब रोज़गार कहते हैं, तो यह थोड़े दिनों के लिए निर्माण में लगे हुए मज़दूरों का रोज़गार नहीं होता. हम जब रोज़गार कहते हैं, तो चाहे वे पढ़े-लिखे हों या ग़ैर पढ़े-लिखे, उनके जीवन में आमदनी की सतत आवक रहे, उसे रोज़गार माना जाता है. लेकिन, रियल स्टेट को बढ़ावा देने का मतलब बिल्डर्स को बढ़ावा देना है.
ग्रामीण विकास की अनदेखी
जब हम ग्रामीण विकास के हिस्से में आते हैं, तो हमें कहीं पर भी ग्रामीण विकास का रोडमैप नहीं मिलता. ग्रामीण विकास का मतलब होता है कि गांवों में हुए उत्पादन की फिनिशिंग करने की इकाइयां गांवों में ही लगाई जाएं, उन इकाइयों द्वारा फिनिश्ड उत्पादों को बाज़ार तक पहुंचाने की उचित व्यवस्था की जाए और खेतों में हुए उत्पादन का भंडारण करने की रणनीति बनाई जाए. लेकिन, ग्रामीण विकास की योजनाओं में इनका कहीं कोई जिक्र नहीं है. इस सरकार का नज़रिया अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक जैसे वर्गों को विशेष रूप से देखने का नहीं है. इसलिए समाज के कमजोर वर्गों को आर्थिक रूप से उठाने की कोई योजना इस बजट में दिखाई नहीं देती. इसकी आशा भी नहीं थी, पर जिस चीज की आशा थी, वह इस बजट में क्यों नहीं है, यह समझ में नहीं आता.
लोगों को कड़वी गोली देने का मतलब पैसे को लोगों की जेब से निकाल कर अनुत्पादक सुविधाओं में डालना नहीं होता. अगर पैसा चाहिए, तो लोगों को उसमें शामिल कीजिए और उन्हें उसकी एवज में वह पैसा दीजिए, जो कमीशन के रूप में आप खाना चाहते हैं. उदाहरण के तौर पर इस देश में लाखों टन अनाज बर्बाद हो जाता है, चूहे खा जाते हैं. हमारे देश में कुछ उत्पादनों के लिए कोल्ड स्टोरेज की ज़रूरत है, लेकिन ज़्यादा ज़रूरत उस अनाज के लिए है, जिसका एक निश्‍चित तापमान पर भंडारण किया जा सके, ताकि उसमें नमी न आए. इसके लिए एफसीआई को कुछ सौ करोड़ रुपये दिए गए. एफसीआई के गोदामों में किस तरह की देखभाल की जाती है, वह सबको मालूम है. वहां प्रति वर्ष लाखों टन अनाज जान-बूझ कर बर्बाद किया जाता है और कुछ अनाज बर्बाद होने के नाम चोरी-छिपे खुले बाज़ार में बेच दिया जाता है.
अगर सरकार के पास थोड़ा भी विजन होता, तो वह घोषणा करती और देश के लोगों से अपील करती कि हम आपको पैमाना देते हैं, आप तापमान नियंत्रित करने वाले गोदाम बनाइए, जिनकी देखभाल जिलाधिकारी करेगा. उनका किराया हम इतने वर्ग फुट और इन सुविधाओं के हिसाब से देंगे. अगर अनाज खराब होता है, तो उसके बदले में हम दंड लेंगे, तो देश में करोड़ों भंडारण के गोदाम लोग बना लेते. सरकार का एक पैसा उन गोदामों को बनाने में नहीं लगता. लोग अपने पैसे से बनाते, अपनी ज़मीन देते और अपने स्तर से ताप नियंत्रित उपकरण लगाते. सरकार को स़िर्फ उसका एक निश्‍चित किराया देना पड़ता और हमारा अनाज 95 प्रतिशत सुरक्षित रहता. अभी जितना जमा होता है, उसका महज 20 प्रतिशत ही सुरक्षित रह पाता है.
अगर सरकार ग्रामीण उद्योगों की शृंखला लगाने की योजना बनाती और उन्हें बाज़ार में लाने के लिए मार्केटिंग यूनिट की बात करती, तो इस देश के करोेड़ों लोगों, और जब मैं करोड़ों कहता हूं, तो दो-तीन करोड़ की बात नहीं कहता, बल्कि कम से कम 25-30 करोड़ लोग कहता हूं, उनके लिए रोज़गार के अवसर खड़े हो जाते और गांव विकसित होना शुरू हो जाते. जिसकी एवज में उन गांवों में स्कूल भी खुलते और अस्पताल भी खुलते. जिसकी शुरुआत स़िर्फ और स़िर्फ स्थानीय स्तर पर ग्रामीण उद्योग लगाए जाने की घोषणा के साथ हो सकती थी. लेकिन, सरकार के दिमाग में वह नब्बे प्रतिशत है नहीं, जो गांव में रहता है या जो उसका वोटर है. उसकी चिंता उस 10 प्रतिशत के लिए है, जो टेलीविजन में, अख़बारों में, स्टॉक मार्केट या पूंजी बाज़ार में रहता है.
बाज़ारवाद का राज
दरअसल, आर्थिक नीतियां ही बजट में झलकती हैं. हमारे देश की आर्थिक नीतियां नब्बे प्रतिशत लोगों के पक्ष में नहीं हैं. ये पूर्णतय: बाज़ार आधारित हैं और खासकर उन लोगों के पक्ष में हैं, जो बाज़ार का समर्थन करते हैं. जो बाज़ार का समर्थन नहीं कर पाते या जिनकी जेब में पैसा नहीं होता, उन लोगों की जेब से भी पैसा निकालने का रास्ता या संकेत यह बजट दे रहा है. हमारा देश ग़रीबों का देश है, जिसमें यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह बाज़ार को नियंत्रित रखे, जिससे ग़रीबों की जेब का पैसा बाहर न निकले. और जो भूखे हैं, नंगे हैं, उन्हें तब तक जीने के साधन उपलब्ध कराए जाएं, जब तक वे स्वयं जीने के साधनों के उत्पादन की प्रक्रियाओं में शामिल नहीं हो जाते. सरकार ने इस स्थिति से अपना हाथ खींच लिया है. अब सरकार ने सारी ज़िम्मेदारी 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में छोड़ दी है, जो 10 प्रतिशत या उनका प्रतिनिधित्व करने वाले वित्त मंत्री चाह रहे हैं कि सरकार की ओर से सब्सिडी के नाम पर जो मदद ग़रीबों को दी जाती है, उसे भी छीन लिया जाए और उसे भी 10 प्रतिशत लोगों की श्रेणी में शामिल कर लिया जाए. जो सत्ता में होते हैं, वे हर तरह से पैसा खींचने की योजना बनाते हैं, लेकिन वे सबके लिए विकास की योजना नहीं बनाते हैं, तब एक डर सामने आता है. वह डर है इस देश में असंतोष का डर, आंदोलन का डर, अराजकता का डर, ग़रीबों के विद्रोह का डर और नौजवानों के विद्रोह का डर.
शिक्षा की कोई नीति इस बजट में दिखाई नहीं दी. प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा का स्तर सुधारने का कोई प्रावधान इस बजट में नहीं है. हर शख्स को किस तरह से स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकती हैं, इसकी कोई रूपरेखा इस बजट में नहीं है. पेयजल एवं सिंचाई का पानी लोगों को कैसे मिलेगा, इसकी कोई रूपरेखा इस बजट में नहीं है. स़िर्फ यह कहा गया है कि आर्सेनिक, फ्लोराइड, भारी विषैले पदार्थों, कीटनाशकों एवं उर्वरकों से प्रभावित 20 हज़ार बसावटों को अगले तीन सालों में सामुदायिक जल सुदृढ़ीकरण संयंत्रों द्वारा साफ़ और सुरक्षित पेयजल मुहैया कराया जाएगा. दरअसल, हमारे देश में पिछले साठ सालों में पेयजल और सिंचाई के पानी की जो बर्बादी हुई है, जिसकी योजना नहीं बनाई गई, उसे नए सिरे से जनाभिमुख योजना बनाने में बदलना चाहिए था, जिसका इस बजट में कोई संकेत नहीं है. स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, सूचना प्रसारण, शहरी विकास एवं आवास आदि मुद्दे ऐसे हैं, जो आम लोगों के पक्ष में कम और 10 प्रतिशत लोगों के पक्ष में ज़्यादा नज़र आते हैं. सरकार का पूरा ध्यान 10 प्रतिशत लोगों के सुख-सुविधाओं पर है. सरकार का सारा ध्यान विदेशी पूंजी पर है.
अब इस बजट में सबसे महत्वपूर्ण मसला है कृषि ऋण का. बेशक, कृषि ऋण की ब्याज दर घटाकर 7 प्रतिशत की गई और समय पर ब्याज लौटाने वाले किसानों को इसमें 3 प्रतिशत की छूट दी गई है, लेकिन समूचा कृषि क्षेत्र कैसे लाभकारी बने, इसकी कोई योजना इस बजट में नहीं है. कृषि यानी किसान की ज़िंदगी अब और परेशान होने वाली है, क्योंकि किसान द्वारा पैदा की गई उपज, चाहे वह कपास हो, गेहूं हो, आलू हो या जितनी चीजें खेत में पैदा हुई हैं, के लिए बाज़ार बिचौलियों के हाथों में ही रहने वाला है. किसान अपनी उपज सस्ते में बेचते हैं और बाकी चीजें काफी महंगी खरीदते हैं. यही कहानी पिछले साठ सालों से चली आ रही है और यही कहानी अगले पांच वर्षों तक चलने वाली है. इस बजट में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ऊर्जा का होना चाहिए था, पर बजट में ऊर्जा के ऊपर जोर नहीं है. इस देश में सौर ऊर्जा का व्यापक इस्तेमाल होना चाहिए, पर सौर ऊर्जा के बारे में सरकार स़िर्फ 500 करोड़ रुपये आवंटित करती नज़र आ रही है. सौैर ऊर्जा ही पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से निकलने वाली ऊर्जा का जवाब है, जिसका हमारे पास अपूर्व स्रोत है, लेकिन उस स्रोत का हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.
कुल मिलाकर यह बजट सबसे ज़्यादा किसी को प्रसन्नता प्रदान कर रहा होगा, तो वह हैं भारत के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, जिनका जिक्र बिना नाम लिए कई बार वर्तमान वित्त मंत्री ने अपने भाषण में किया. जैसा उन्होंने कहा था, जैसा वह सोचते थे, जैसा उन्होंने प्रावधान किया था, हम उसी को आगे बढ़ा रहे हैं. चिदंबरम ने इस देश की ज़िंदगी को ज़हरीला और कमजोर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, क्योंकि उन्होंने बाज़ार आधारित नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था को और ज़्यादा सख्त, ज़्यादा क्रूर बनाने में अपनी ताकत लगा दी थी. हमारे वर्तमान वित्त मंत्री भी वही कर रहे हैं और वह यह भूल रहे हैं कि नरेंद्र मोदी ने चुनाव में क्या वादे किए थे.
आख़िर में हम यह आलोचना इस अनुरोध के साथ कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी जी, अगर हमारी इस आलोचना में आपको कहीं पर तर्क नज़र नहीं आता और वह परिणाम नहीं निकलने वाला, जो हम कह रहे हैं, तो हम आपकी दृष्टि का समर्थन करेंगे, क्योंकि हम नहीं चाहते कि हमारी आशंकाएं सच साबित हों, बल्कि हम चाहते हैं कि आपके वे सभी वादे सच हो, जो आपने अच्छे दिनों के नाम पर किए. लेकिन, आपका बजट हमारी समझ में अब तक नहीं आ रहा कि यह महंगाई कैसे दूर करेगा. दूर करना तो दूर, कम कैसे करेगा, भ्रष्टाचार कैसे दूर करेगा, बेरोज़गारी कैसे दूर करेगा? इस देश के नब्बे प्रतिशत लोगों के मन में निराशा पैदा हो गई है, जिसे आपने अपने भाषणों से विश्‍वास दिलाया था कि नई सरकार के आते ही उसके सामने दरवाजे खुलते नज़र आएंगे, लेकिन ये दरवाजे तो और मजबूत ताले में बंद दिखाई दे रहे हैं. आपने यह बजट सोच-समझ कर संसद में पेश करने की अनुमति दी होगी. यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले दो से तीन महीने में हमारी ज़िंदगी के ऊपर या देश की ज़िंदगी के ऊपर इस बजट का क्या असर पड़ता है? देश की ज़िंदगी का मतलब दस प्रतिशत की ज़िंदगी नहीं, बल्कि नब्बे प्रतिशत की ज़िंदगी है.
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शनिवार, 26 जुलाई 2014

महिलायें श्रंगार क्याें करती है?

आज भारत में महिलायंे जो श्रृंगार करती है वह वास्तव मंे गुलामी की निशानी है!
हमारी  महिलाएँ नाक - कान  छेेदकर तरह - तरह की गहने पहनती है । इनकी हाथों मे चुडियाँ है वह गुलामी का प्रतीक है।
 जब हमने इतिहास पढ़ा कि फ्रांसीसी का, शाक्यो का, हुुणो का, पुर्तगालियों का, मुगलांे का आक्रमण और जब आर्य का आक्रमण सिंधुघाटी की सभ्यता के बारें में पढा़ कि आर्यो का आगमन ऐसे हुआ जैेसे भारत मे उनकी रिश्तेदारी थी, जैसे रिश्तेदार के घर पर आये थे। कार्लमाक्र्स ने कहा था कि संदेह करो और मुद्दा बनाओ। इनको जितनी भी नीतियां है उन सारी नीतियांे पर संदेह करने की जरूरत है। उसंे मुदा बनाने की जरूरत है। आज जाति प्रमाण-पत्र का जो मुद्दा है। इस पर भी हमारे साथी लगातार बहस कर रहे है तथा बहुत सारें मुद्दों का जिक्र किया ऐसा दिखायी  देता है कि निगाहे कहीं और  निशाने कहीं और वाली कहवत चरितार्थ होती है। अंर्तराष्ट्रीय राजनीतिक को अगर देखा जाए तो अंर्तराष्ट्रीय राजनीतिक के पटल पर अमेरिका इस समय काफी उभरा हुआ  है। उसके ब्राह्मणवादी चरित्र को देखा जाए। वह कहता है कि इराक परमाणु हथियार  से भरा -पडा़ है वहाँ पर लोकतंत्र नही है। वहाँ पर तानाशाही है, और हमला कर देता है  ओैर कहता है कि हम वहाँ लोकतंत्र कायम करना चाहते हैं और उस देश पर हमला करके खनिज, सम्पदा जैसे तेल के कुँआ को  लूटकर उसे आग केे हवाले कर देंता है। इसी तरह से अफगानिस्तान में आतंकवाद के नाम लेकर अफगानिस्तान पर हमला किया। अफगानिस्तान पर हमला करने के पीछे भारत पर निगाहें रखने की योजना थी कि अगर हम अफगानिस्तान पर हमला करतेे है तो भारत जो एक मजबूत सख्त देश है यह हमारी मुट्ठी मंे होगा और हमारी गुलामी करेगा। इस तरह की कूटनीति करके अमेरिका ने भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया हैं। नीति उसकी है इसलिए हर नीति पर संदेह करने की जरूरत है ओेेैर मुदा बनाने की आवश्यकता है। मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाने की जरूरत है। आज हम आजदी की बाते करतें हैं तो ये लोग कहते है देश तो आजाद है आप किस आजादी की बात करतंे हो। जब हम अपने समाज की ओर चलते हैं तो दिखाई देता है कि हमेें किस तरह की आजादी की जरूरत है। हर क्षण  एक भूख और कुपोषण के शिकार हो रहे हैै। लोग भुखमरी से हर दिन मर रहे है। ये हमारे मूलनिवासी समाज के ही अपना भाई है जिनकी ऐसी हालात में जिंदंगी काट रहे है। उनको भूख से मरने की मजबूरी है। इस तरह से किसान भी आत्महत्या करनंे पर मजबूर हैं। इस तरह से किसानो की आत्महत्या करने की आजादी है। हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। छोटी-मोटी बिमारियों से मर रहा है, क्योकि उन्हे मरने  की  आजादी है लगभग 11.3 करोड महिलाआंे को शरीर ढ़ँकने के लिए कपडा़ उपलब्ध नहीं है। वह हर रोज स्नान नहीं करती है। उन्हे गंदे, मटमैले लिबास मेें रहने की आदत है। गंदे पानी पीनें के लिए करोडो़ं लोग मजबूर है। क्योकि यह उनकी आजादी है, इस तरह की आजादी को वे लोग आजादी कहते है। हम उनकी गुलामी करे वे हमें आजाद समझते है हम उनके खिलाफ विद्रोह करते है। तो वे लोग कहते है ये लोग नक्सलवादी और माओवादी है। हम इस आजादी का विरोध करते है। हम माओवादी अवश्य है, माओवादी हथियार का दर्शन नहीं है, बल्कि माओवादी प्रतिरोध का दर्शन है। जिस तरह से एक बेटे पर अत्याचार होता है तो उसका बाप प्रतिरोध करता है, उसी तरह से एक माँ पर अत्याचार होता है तो बेटा प्रतिरोध करता है। किसी की बहन-बेटी की इज्जत को लूटी जाती है तो वह प्रतिरेाध करता है इसलिए माओवाद प्रतिरोध का दर्शन है, माओवाद हथियार का दर्शन नहीं है। इस तरह से अफगानिस्तान और वियतनाम पर हमला कर अमेरिका ने उसें लूटने का काम किया। आज इन ब्राह्मणों ने हमे जाति और उपजाति में टुकडे़-टुकड़े करके छिन्न्ा-भिन्न्ा करके हमारे ऊपर शासन करते कर रहा है। क्योकि इन लोगों ने हमारी ताकत को समझते है। साथियो, लोगों का कहना है कि धर्म पूँजीपतियों के कल्याण के लिए होता है। यह सही है क्योकि धर्म ने हमेशा पूँजीपति वर्ग ओैर दबंगो का ही पक्ष लिया है। इस तरह से राजा को धर्म ने कहा कि राजा ईश्वर का प्रतीक होता है। सती प्रथा थी, सती प्रथा के खिलाफ किसी भी राजा ने आवाज उठायी। हजारो स्त्रियो को जलाकर राख कर दिया लेकिन किसी धर्मशास्त्रो में इसके खिलाफ मे कुछ नहीं  लिखा। धर्मशास्त्रो ने किसी नीति का निर्धारण नहीं किया। सती प्रथा के अंतर्गत किसी स्त्री को चिता सजायी जाएगी तो कौन  सा मंत्र का उच्चारण किया जाएगा, जब चिता सजायी जाएगी तो विधवा स्त्री किस दिशा में अपना चेहरा करके बैठेगी। दूसरी तरह जो लोेग इसका विरोध करते थे उसे असूर, राक्षस और दैत्य, दानव कहकर उनकी हत्या किया जाता था, इसे धर्म कहा जाता था। इस तरह से धर्म उस समय राजा के साथ था। धर्म कहता था कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। इतना ही नहीं हमारे भारत देश मे कुछ राजाओे को भगवान का दर्जा दिया जाता है। लेकिन जनता की ताकत ने उस राजतंत्र को उखाड़ फेका। जिसे ईश्वर की प्रतिनिधि माना जाता था। जनता कि ताकत ने उस अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेका। जिस राज मे सूर्य अस्त नहीं होता था, उसे भी उखाड़ फेका। उन्हांेने वर्तमान समय मे मिश्र की ताकत को उखाड़ फेका। जनता सडक पर उतर आई है सभी देश हैरान है, वह हार चुके है। उधर अमेरिका बोल रहा है हुश्न मुबारक अपनी सŸाा छोडे़ और जनता की आवज को सुने और इधर अमेरिका की खुफिया एजेन्सी हुश्न मुबारक के साथ खडी़ है। ऐसा है अमेरिका का दोगली चरित्र! आज पूँजीपति वर्ग को हमारी ताकत का एहसास हो गया है। उनके पास हजारो तोपे है, लाखों बंदूके हैंे और पचास लाखों से अधिक सेनाएँ है फिर भी आज जनता की ताकत से डर रहा है। क्योकि हमारे पास कुछ भी नहीं है तो वह सिर्फ सगंठन की ताकत है। ब्राह्मण यह नही चाहता है कि मूलनिवासी एक मंच पर आकर संगठित हो जाए। जिस दिन हम सभी मूलनिवासी बहुजन संगठित हो जाएगे उस दिन ये ब्राह्मण हमारे मुकाबला नहीं कर सकते है। उनकी बंदूके, तोपे अथाह खँजाने किसी काम का नहीं रह जाएगा। सत्ता हमारे हाथों मेें होगी। साथियों, आज यह जाति प्रमाण-पत्र की समस्या है। हमंे पाँच हजार साल से जातियो और उपजातियो मेे बांटकर हमे तड़पाया है, इतना ही नहीं जरूरत पड़ी तो हमें काट डाला। इस तरह  से हमारे महा पुरूषो को गुलाम बनाया जाता था। किन्तु महिलाएँ तो आजाद थी क्योकि यहाँ नारी प्रधान समाज था। यहाँ की महिलाएँ ने पुरूषांे से अधिक संघर्ष किया, इनको पुरूषों से अधिक खतरनाक समझा गया। यही कारण है कि इन आर्य ब्राह्मणांे  ने इनकी नाक, कान को छेेद किया। इन्हे नाक-कान छेद कर रस्सी से बांधा गया। क्यांेकि स्त्रियों का विद्रोह बहुत ही खतरनाक था। आज हमारी महिलाएँ  नाक-कान छेेदकर उसमे तरह-तरह के गहने पहनती है। इनकी हाथों में चुडियाँ है वह भी गुलामी की निशानी है। आज हम जिसे श्रृंगार कहते हैं वह वास्तव मे गुलामी है इनकी   और यह सत्य इतिहास हैं साथियो आज छोटे-छोटे आन्दोलन चल रहे है, उसे एक सूत्र में जोड़ना  होगा और उसे राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के रूप देकर उसे जन-आन्दोलन मंे परिवर्तन करना होगा तभी  हमारे आदिवासी समाज का कल्याण होगा। हमें आजादी कि लिए लडा़ई लड़नी होगी, क्योंकि इस दुनिया मे आजादी से बढकर कोई चीज नही है।

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

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माओवाद से अभिशापित छत्तीसगढ़ अब देश में लड़कियों की तस्करी की सबसे बड़ी मंडी बन चुका है। सूबे की बालिग-नाबालिग लड़कियों को देश के अलग-अलग प्रदेशों में सप्लाई किया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के लिहाज से पिछले पांच सालों में नौ हजार लड़कियां गुमशुदा हुई हैं, लेकिन तहलका की पड़ताल में चौंकाने वाले त







थ्य सामने आए हैं कि छत्तीसगढ़ की कई हजार लड़कियों को दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर जैसे प्रदेशों में बेचा जा चुका है, लेकिन पुलिस थानों में इनकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई है। बार-बार मानव तस्करी की सूचना मिलने पर जब तहलका इसकी पड़ताल पर निकला तो कई लड़कियों की दर्दनाक दास्तान सामने आई।
सूबे के हालात ये हैं कि इन दिनों हजारों मां-बाप अपनी बेटियों को तलाश रहे हैं....उनकी बेटियां कहां हैं...किस हाल में है...वे घर-गांव से गायब होकर कहां चली गईं...इसका जबाव किसी के पास नहीं है...किसी की बेटी महीने भर पहले गुमशुदा हुई है तो किसी का वर्षों से पता नहीं है....प्रदेश की इज्जत को तार-तार करने वाली ये भयावह तस्वीर केवल छत्तीसगढ़ के दूरस्थ आदिवासी इलाकों की ही नहीं बल्कि राजधानी रायपुर की भी है...जहां पिछले पांच सालों में करीब डेढ़ हजार लड़कियां गायब हुई हैं। जबकि पूरे प्रदेश से करीब नौ हजार लड़कियों की गुमशुदगी दर्ज हुई है (ये आंकड़ा सरकारी है..जबकि हकीकत में लापता लड़कियों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है)...दरअसल माओवाद जैसे नासूर को झेल रहे छत्तीसगढ़ में पिछले दस सालों से मानव तस्करी का धंधा भी चरम पर हैं....या यूं कहें कि छत्तीसगढ़ देश में मानव तस्करी की सबसे बड़ी मंडी बन चुका है तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। प्रदेश के आदिवासी जिले नारायणपुर, जगदलपुर, कांकेर, कोंडागांव से तो लड़कियां गायब हो रही हैं, वहीं जशपुर, रायगढ़, कोरिया, सरगुजा, बिलासपुर, दुर्ग जैसे शहरों से भी लड़कियों की सप्लाई धडल्ले से चल रही है। प्रदेश की भोली भाली आदिवासी लड़कियों को तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर यानि प्रदेश के बाहर हर दिशा में बेचा जा रहा है। मानव तस्करी के इस रैकेट में प्लेसमेंट एंजेसियों के साथ-साथ स्थानीय दलाल भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि कुछ समय पहले तक यही लग रहा था कि प्रदेश में रोजगार की कमी और गरीबी के चलते पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसका फायदा प्लेसमेंट एंजेसियां उठा रही हैं...और नौकरी देने का झांसा देकर लड़कियों को बेचा जा रहा है, लेकिन तहलका की पड़ताल में बस्तर समेत दूसरे इलाकों में लड़कियों की तस्करी के एक नए रैकेट का खुलासा हुआ है। बस्तर के आदिवासी जिलों से लड़कियों को केवल नौकरी दिलाने के नाम पर नहीं, बल्कि उन्हें दक्षिण भारत के मंदिरों के दर्शन करवाने या फिर शादी करके बाहर ले जाने के प्रकरण सामने आए हैं। दलाल स्थानीय लड़कियों से शादी भी कर रहे हैं ताकि उन इलाकों की दूसरी लड़कियों का विश्वास जीतने में आसानी हो।
छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी कई बार इस मामले को उठाया गया है। लेकिन राज्य सरकार एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग कमेटी बनाने के अलावा कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है। प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने पिछले साल सदन में ये गंभीर स्वीकरोक्ति की थी कि प्रदेश से रोजाना पांच बालिकाएं गायब हो रही हैं। पूर्व गृहमंत्री द्वारा सदन में पेश आंकड़ों पर नज़र डालें तो पिछले पांच सालों में पुलिस थानों और चौकियों में लड़कियों की गुमशुदगी के नौ हजार प्रकरण दर्ज हुए हैं...इसमें भी चौकाने वाली बात ये है कि सबसे ज्यादा लड़कियां राजधानी रायपुर से गुम हुई हैं... सरकारी दावे ये भी हैं कि पिछले पांच सालों में गुम नौ हजार लड़कियों में से पुलिस ने आठ हजार लड़कियों का पता लगा लिया गया है। जबकि बस्तर के सभी जिलों को मिलाकर करीब एक हजार लड़कियों का कोई पता नहीं चल रहा है.. हालांकि ये सरकारी आंकड़े हैं..लेकिन हकीकत में प्रदेश के रायगढ़, जशपुर, सरगुजा और बस्तर के इलाकों से अब तक बेहिसाब लड़कियां गायब हो चुकी हैं...इनमें कईयों की गुमशुदगी की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की गई है। कांग्रेस के दिंवगत नेता नंदकुमार पटेल हर बार विधानसभा में इस मामले को उठाते रहे कि अकेले उनके विधानसभा क्षेत्र रायगढ़ से हजारों लड़कियां गायब हुई हैं...उनके पास गायब बालिकाओं की पूरी सूची थी...उनका ये भी आरोप था कि कईयों के मामले पुलिस ने दर्ज किए हैं कईयों के नहीं...पटेल बार बार ये मांग करते कि मानव तस्करी रोकने के लिए कड़े कानून बनाए जाएं..साथ ही प्रदेश की गुमशुदा बालिकाओं की खोज खबर ली जाए..लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई।
छत्तीसगढ़ के नए नवेले गृहमंत्री रामसेवक पैकरा कहते हैं कि, हम मानव तस्करी को लेकर गंभीर हैं। यही कारण हैं कि मैने पद संभालते ही पुलिस महकमे को निर्देश जारी कर दिया है कि इसके खिलाफ तत्काल कड़े कदम उठाए जाएं। पैकरा ये भी कहते हैं कि ये एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन हम गंभीरता से इसे रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं
प्रदेश की महिला और बाल विकास मंत्री रमशीला साहू की मानें तो उनका विभाग अपने स्तर पर इसे नियंत्रित करने की कोशिश करेगा। हालांकि वे ये भी कहती हैं कि ये गृह विभाग का मामला है, लेकिन चूंकि मामला युवतियों से जुड़ा हुआ है, इसलिए महिला और बाल विकास विभाग भी इसे रोकने के लिए अपनी भूमिका तय करेगा
राज्य सरकार ये तो मानती है कि प्रदेश में लड़कियों की तस्करी जारी है। यही कारण है कि 2011 में चार जिलों को मानव तस्करी के अड्डों के रूप में चिन्हाकिंत किया गया था। जिनमें जशपुर पहला, रायगढ़ दूसरा, सरगुजा तीसरा एवं कोरबा को चौथे नंबर पर रखा गया था। इसके अलावा महासमुंद, जांजगीर, बलौदाबाजार व बिलासपुर को संवेदनशील इलाके माना गया था। जबकि बस्तर के नारायणपुर, कोंडागांव, जगदलपुर, सुकमा, बीजापुर, कांकेर जैसे इलाकों की तरफ तो कभी ध्यान ही नहीं दिया गया। ऐसे में मानव तस्करों और उनके दलालों के लिए ये संजीवनी मिलने जैसा हो गया। उनके हौंसले इतने बढ़े कि पिछले पांच सालों में आदिवासी जिलों की भोली-भाली लड़कियों को प्रदेश के हर तरफ सप्लाई किया जाने लगा। राज्य सरकार ने प्लेसमेंट एंजेसियों के खिलाफ भी कार्रवाई की है। अकेले जशपुर में ही सात प्लेसमेंट एजेंसियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किए गए हैं। आपको बताते चलें कि झारखंड़ की सीमा से लगे जशपुर में ही सबसे ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां सक्रिय हैं...सरकारी आंकड़ें भले ही रायपुर में लड़कियों की गुमशुदगी की संख्या ज्यादा दिख रही है..लेकिन हमारी पड़ताल बताती है कि आदिवासी जिले नारायणपुर, कोंडागांव, जगदलपुर, बीजापुर, सुकमा के साथ ही जशपुर की हजारों लड़कियां गायब हैं...लेकिन गरीबी और अशिक्षा की वजह से मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।
मार्च 2013 में ही दो दलालों को रायपुर पुलिस ने रायपुर रेलवे स्टेशन पर 15 लड़कियों के साथ पकड़ा था। नारायणपुर की इन 15 लड़कियों को नागपुर ले जाया जा रहा था। इन्हें काम दिलाने की लालच में इनके घरों से लाया गया था...बतौर एडवांस इनके परिजनों को एक एक हजार रुपए भी दिए गए थे। रायपुर स्टेशन पर पकड़ी गई लड़कियों की उम्र उम्र महज 10 से 17 साल थीइनके साथ पकड़े गए दो स्थानीय दलाल मणिराम और बी वेंकट रेड्डी फिलहाल जेल में है। इन्हें नागपुर पहुंचकर तस्करों से मोटी रकम हासिल होने वाली थी। इनमें मणिराम बस्तर का निवासी है..जिसे हल्बी बोली आती है..क्योंकि ये बच्चे जिन इलाकों से लाए गए थे..वहां हिंदी या छत्तीसगढ़ी नहीं बोली जाती...बल्कि हल्बी का प्रचलन है। तस्करी का शिकार हुई लड़कियों में केवल दो को ही हिंदी समझ आ रही थी, बल्कि सभी हल्बी बोलने वाले थे। तस्करी का शिकार हुई 10 वर्षीय बालिका हड़मा मरकामी ने कभी स्कूल नहीं देखा था...उसका कहना है कि लड़कियां पढ़ाई नहीं करती..वह भी नागपुर जाकर मजदूरी करने निकली थी।
वहीं हाल ही में जशपुर जिले में मानव तस्करी के आरोप में एक युवक को 14 जनजातीय लड़कियों व छह अन्य के साथ गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अफसरों के मुताबिक 26 वर्षीय मृणाल नायक को गुरुवार रात राजधानी रायपुर से 400 किलोमीटर दूर स्थित जनजातीय बहुल इलाके कुनकुरी से गिरफ्तार किया गया। पुलिस अधिकारी आर कौशिक ने बताया कि, हम मानव तस्करी रैकेट में सक्रिय एक युवक का कई सप्ताह से पीछा कर रहे थे। अंतत: कुनकुरी में एक बस स्टैंड से उसे गिरफ्तार किया गया। उस समय वह अपने साथ 20 स्थानीय लोगों को लेकर जा रहा था, इनमें 14 लड़कियों सहित ज्यादातर नाबालिग थे। यह मानव तस्करी का मामला है। पकडा गया दलाल उड़ीसा का रहने वाला है
कुनकुरी पुलिस ने 30 दिंसबर 2013 को ही एक प्लेसमेंट एजेंसी चलाने के बहाने लड़कियों की तस्करी करने वाली ताराबाई चौहान को गिरफ्तार किया है। ताराबाई ने फरवरी 2013 में किशोरी को दिल्ली में बेच दिया था। लड़की को दिल्ली के पॉश इलाके में घरेलू काम के लिए लगाया गया था। लड़की ने किसी तरह परिजनों को फोन पर खुद के दिल्ली में होने की सूचना दी। तब पुलिस ने परिजनों के बयान पर प्लेसमेंट संचालिका ताराबाई चौहान को गिरफ्तार कर लड़की को बरामद किया।
ये घटनाएं तो बानगी भर है, छत्तीसगढ़ का नक्शा उठाकर देखें तो पाएंगे कि दक्षिण के तरफ के आदिवासी जिलों की लड़कियों को सटे हुए प्रदेशों यानि आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु भेजा रहा है। ऊपर की तरफ के जिले रायगढ़, सरगुजा, जशपुर, बिलासपुर की लड़कियों को दिल्ली ले जाया जा रहा है। वहीं रायपुर, बालोद, दुर्ग की लड़कियों को मुंबई और महाराष्ट्र के दूसरे इलाकों में सप्लाई किया जा रहा है यानि मानव देह के तस्कर बेखौफ लड़कियों को बेचकर अपनी तिजोरियां भरने में लगे हुए हैं।
ये कोढ़ में खाज जैसा ही है कि किसी तरह घर लौट आईं राजेश्वरी, फुटुन, सिंगाय जैसी लड़कियों की दुखद दास्तान राज्य सरकार के कानों तक नहीं पहुंच पा रही है। जबकि खुद राजेश्वरी और फुटुन बार-बार यही गुहार लगा रही हैं कि उनकी तरह दूसरी बंधक लड़कियां भी उस नर्क से निकलकर घर आने के लिए तड़प रही हैं। अब असहाय, गरीब और मजबूर लड़कियों की पुकार से कब नीति निर्धारकों का कलेजा पसीजेगा, इसका इंतजार को व़क्त को भी है। किंतु इतना जरूर है कि यदि समय रहते प्रदेश को मानव देह की मंडी में तब्दील कर चुके दलालों पर शिकंजा नहीं कसा तो स्थिति विस्फोटक हो जाएगी। कभी स्त्री-पुरुष संतुलित अनुपात पर गर्व करने वाला राज्य हर रोज बिक रही बेटियों के मामले में किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं बचेगा।
बालाजी मंदिर के दर्शन के बहाने बेचा
नाम-राजेश्वरी पिता गोपाल सलाम। उम्र 29 वर्ष। पता- गांव जनकपुर, तालुका-भानुप्रतापपुर, जिला कांकेर।
आप जब राजधानी रायपुर से बढ़ते हुए बस्तर में प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले आपके पड़ाव में आता है कांकेर जिला। इसी जिले में एक गांव है जनकपुर। जनकपुर आप अपनी रिस्क पर ही जा सकते हैं क्योंकि माओवादी गतिविधियों के लिए कुख्यात इस गांव में जाने के लिए आपको कच्ची पगडंडियों का सहारा लेना होगा। कांकेर के अत्यंत पिछड़े इस गांव जनकपुर में रहती है राजेश्वरी सलाम। हमें राजेश्वरी से मिलना था, क्योंकि यही वो लड़की है, जिसकी मदद से पुलिस ने तमिलनाडु के नामाक्कल में बंधक 60 गौंड आदिवासी लड़कियों को मुक्त कराया था। राजेश्वरी से संपर्क करना बहुत मुश्किल था, क्योंकि उसके गांव में इक्का-दुक्का लोगों के पास ही मोबाइल फोन हैं। किसी तरह उससे संपर्क हो पाया तो उसने हमें जनकपुर आने से मना किया और संदेश भेजा कि वही हमसे मिलने कोंडागांव (बस्तर का एक अन्य जिला) आएगी। कोंडागांव में हुई मुलाकात में राजेश्वरी ने जो किस्सा सुनाया, वो रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है। साथ ही वो एक जीता जागता दस्तावेज भी है, जो बताता है कि गरीबी और पिछ़ड़ेपन की मार झेल रहा बस्तर किस तरह से मानव तस्करी की सबसे बड़ी मंडी बन बैठा है।
राजेश्वरी के माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे। उसका एक बड़ा भाई भी है, लेकिन शराब की लत के कारण उसका होना ना होना बराबर है। यही कारण है कि राजेश्वरी की भाभी भी उसके भाई को छोड़कर चली गई। अपनी भाभी को मनाने के लिए उनके घर यानि नारायणपुर जिले के एक नक्सल प्रभावित गांव बड़े जम्हरी जाते वक्त राजेश्वरी ने यह नहीं सोचा था कि उसकी ये यात्रा उसके जीवन का काला अध्याय बन जाएगी। राजेश्वरी तो केवल कुछ दिन के लिए अपनी भाभी के घर पहुंची थी। ऐसे ही एक दिन गांव की कुछ लड़कियों के साथ खड़े तीजूराम कोर्राम (दलाल) ने उससे कहा कि वो सभी लड़कियों को तिरुपति बालाजी मंदिर दर्शन करवाने के लिए ले जा रहा है। अगर वो चलना चाहे तो साथ चल सकती है। गांव की लड़कियों ने भी जोर डाला तो राजेश्वरी को लगा कि अच्छा मौका है, गांव की लड़कियों के साथ वो भी घूम आएगी। एक निश्चित दिन यानि 4 अगस्त 2013 को गांव की 12 लड़कियां तीजूराम कोर्राम के साथ बड़े जम्हरी (नारायणपुर) से निकले। पहले वे कोर्राम के नयानार स्थित घर गए। एक रात वहीं बिताई। इसके बाद नारायणपुर और कोंडागांव जिलों के बीच स्थित बेनूर गांव में पहले से उनका इंतजार कर रही वेन से पहले जगदलपुर पहुंचे। फिर वहां से बस में सवार होकर विजयवाड़ा होते हुए तमिलनाडु के सेलम और फिर नामाक्कल पहुंच गए। एक बोलेरो में भरकर सभी लड़कियों को एक स्थानीय फैक्ट्री द जेम्स एग्रो एक्सपोर्ट्स लाया गया और बंधक बना लिया गया। राजेश्वरी बताती है कि, जब मैने पूछा कि मंदिर घुमाने लाए थे, यहां कंपनी में कहां ले आए हो, तो उसे जबाव दिया गया कि पैसा खत्म हो गया है, अब यहां काम करना पड़ेगा। बस वहीं से राजेश्वरी को दुनिया अंधेरे में डूब गई। राजेश्वरी बताती है कि वहां करीबन 100 लड़कियां थी। उन्हें एक ही कमरे में सोना पड़ता था। एक ही गुसलखाना था, जिसे बारी-बारी से इस्तेमाल करना होता था। ऐसे में एक दिन राजेश्वरी के लिए राहत का पैगाम लेकर आया। उसे बेचने वाला दलाल तीजूराम कोर्राम लड़कियों के दूसरे दल को छोड़ने पहुंचा। राजेश्वरी ने उससे जिद की कि उसे घर वापस जाना है क्योंकि उसके शरीर में एलर्जी हो गई है। काफी मान मनौव्वल के बाद इस शर्त पर तीजूराम उसे बस्तर लाने को तैयार हुआ कि वो उसे कम से कम दस लड़कियां बहला-फुसलाकर देगी। बदले में उसे भी प्रति लड़की पांच सौ रुपए मिलेंगे। ये संयोग ही था कि जब राजेश्वरी को वापस लाया जा रहा था, तब उसके चंद रोज पहले ही फैक्ट्री की सफाई करते वक्त उसे वहां के एक अधिकारी के विजिटिंग कार्ड पड़ा मिला, जिसे उसने सहेज कर रख लिया था। राजेश्वरी जैसे तैसे वापस आई। कुछ समय बाद उसकी मुलाकात महिला और बाल विकास विभाग की पर्यवेक्षक जगमति कश्यप से हुई। राजेश्वरी ने जगमति को पूरा किस्सा सुनाया। फिर क्या था, जगमति ने कुछ समाजसेवियों से संपर्क किया। इसके बाद नंबवर 2013 में पुलिस ने उस विजिटिंग कार्ड की मदद से नामाक्कल में चल रही द जेम्स एग्रो एक्सपोर्ट्स 60 आदिवासी लड़कियों को छुड़वाया। इसके ठीक पहले भी नारायणपुर जिला प्रशासन 24 लड़कियों को तमिलनाडु के इरोड जिला से छुडवा कर लाया था।
राजेश्वरी ने एक अहम बात ये भी बताई कि एक बिहारी युवक स्थानीय आदिवासी युवती से शादी कर नारायणपुर के ही नयानार गांव में रहने लगा है। वह युवक तस्करों के गिरोह की अहम कड़ी है। हालांकि वो अभी तक पुलिस के हाथ नहीं लगा है। लेकिन उस बिहारी युवक ने अपनी पत्नी की मदद से अपने गिरोह में कई स्थानीय दलालों को जोड़ लिया है। बेरोजगारी, गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठाकर ये दलाल आदिवासी लड़कियों को अलग-अलग सपने दिखाकर अपने चंगुल में फंसाते हैं, फिर दक्षिण भारत में जाकर बेच देते हैं।
कुछ लड़कियों को सुलाते थे अलग
नाम सिगाय पिता बेजूराम मंडावी। उम्र 21 वर्ष। गांव बड़े जम्हरी जिला नारायणपुर।
हमारा अगला पड़ाव था नारायणपुर, जिसका नाम सुनते ही जेहन में केवल पुलिस-नक्सली मुठभेड़ के दृश्य ही उभरते हैं। माओवादियों की राजधानी कहे जाना वाला अबूझमाड़ (जो अब तक बूझ  है) भी इसी जिले में पड़ता है। नारायणपुर जाते वक्त जब आप राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर चल रहे होते हैं तो सड़क पर पड़ने वाली हर पुलिया आपको क्षतिग्रस्त मिलती है। जो आपको पिछले सुंरगी विस्फोटों की याद दिलाने के लिए काफी है। बीच-बीच में कहीं-कहीं सीआरपीएफ के कैंप और उनके रंगरूट नजर आते हैं। लेकिन दूर-दूर तक ना तो कोई ग्रामीण और ना ही कोई स्थानीय पुलिसवाला आपको दिखाई देगा। हमें बड़े जम्हरी में रहने वाली उन छह गौंड युवतियों को ढूंढना था, जिन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस तमिलनाडु से आजाद करवाकर लाई है, ये युवतियां जो बस्तर में चल रही मानव तस्करी का जीता-जागता प्रत्यक्ष प्रमाण भी हैं। लेकिन बड़े जम्हरी जाने के लिए हमें किस तरफ मुड़ना होगा, ये बताने के लिए कई-कई किलोमीटर तक हमें कोई नज़र नहीं आया। नतीजन हम बड़े जम्हरी को पीछे छोड़ते हुए हम सात किलोमीटर आगे निकल गए। तब गौंडी जानने वाले दो आदिवासियों ने हमें बताया कि हमें वापिस पीछे जाना होगा। राष्ट्रीय राजमार्ग से पगडंड़ी से उतरते ही समझ आया कि विकास की चमक केवल ऊपरी ही है। संकरे, उबड़-खाबड़ रास्ते, धूल से सराबोर पगडंडी पर हौले-हौले अपना चारपहिया चलाते हुए बड़े जम्हरी पहुंचे। जहां हमारी पहली मुलाकात सिगाय मंडावी से हुई।
राजेश्वरी के दल में ही सिगाय मंडावी पिता बेजूराम (21 वर्ष) भी थी। 2007 में जब सिगाय ने नौवीं कक्षा पास की तो वो अपने गांव में सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की कहलाने लगी थी लेकिन सिगाय ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे बेच दिया जाएगा। सिगाय बताती है कि वो नारायणपुर के शासकीय हाई स्कूल पढ़ने जाती थी, तब उसकी पहचान बिज्जू नामक युवक से हुई। बिज्जू उसके ही स्कूल में पढ़ रहा था। एक दिन बिज्जू ने उसकी मुलाकात अपने बड़े भाई तीजोराम से यह कहकर करवाई कि नौकरी दिलाने में तीजोराम उसकी मदद कर सकता है। बाद में उसी तीजोराम ने उसे तमिलनाडु ले जाकर बेच दिया। सिगाय ने तहलका को बताया कि हम लड़कियों को ककड़ी (खीरा) छांटने और उसे रसायन में भिगोने का काम करना होता था, ताकि वे खराब ना हों। लेकिन इस रासायनिक प्रक्रिया में लड़कियों की चमड़ी पर कई तरह की एलर्जी हो जाया करती थी। खुद राजेश्वरी के हाथ-पैर की चमड़ी उतरने लगी थी। लेकिन इन लड़कियों को इलाज पाने या आराम करने की इजाज़त नहीं होती थी। सिगाय कहती है कि अत्याचार की हद ये थी कि दिन-रात काम करने के बाद भी लड़कियों को महीने के अंत में कोई तनख्वाह नहीं दी जाती थी, मिलता था केवल सौ रुपए का एक नोट, जिससे महिने भर के लिए लड़कियां साबुन-तेल मंगवाती थीं। कुछ लड़कियों को शादी का झांसा भी दिया जाता था। हद तो तब हो जाती थी, जब हममें से कुछ लड़कियों को रात में अलग सोने के लिए मजबूर भी किया जाता था, जिसके कारण दो लड़कियां गर्भवती भी हो गई थीं, ये इस बात का प्रमाण है कि इन लड़कियों के साथ रात में जबरन दुष्कर्म किया जाता था। (गर्भवती लड़कियों के नाम जानबूझकर उल्लेखित नहीं किए गए हैं)
सौदा तय होने से पहले भाग कर बचाई जान
नाम-फुटुन उर्फ फूलवंत। उम्र 13 वर्ष। गांव जमनियापाठ, जिला जशपुर।
ओडिसा बॉर्डर पर स्थित जशपुर जाते वक्त आपको सलाह दी जाती है कि आपको जहरीले सांपों से बचकर रहना होगा, क्योंकि जरा सी असावधानी होने पर कोई भी सांप आपकी जान ले सकता है। दुर्लभ ग्रीन पिट वाइपर से लेकर कोबरा और रसल वाइपर तक सभी जहरीले सांप यहां पाए जाते हैं, लेकिन इन विषराजों के बीच में ही पनप रहे इंसानी सांपों से आपको कोई आगाह नहीं करेगा। कभी सांपों की दुर्लभ प्रजातियों के लिए मशहूर जशपुर अब मानव तस्करी की खबरों की लिए अखबारों में सुर्खियां पाता है। ऐसी तस्करी का शिकार फुटून भी हुई।
फुटून 8 साल पहले अगवा हुई थी। उसे दिल्ली के एक मकान में कैद किया गया था। जशपुर जिले के सन्ना थाना क्षेत्र में आने वाले जमनियापाठ गांव की रहने वाली फुटून अभी केवल 13 साल की ही है। मतलब जब वर्ष 2005 में उसे अगवा किया गया था, तब उसकी उम्र महज 5 साल सात महीने थी। जब कई महीनों ढूंढने के बाद भी फुटून नहीं मिली तो उसके परिवारवालों ने उस मरा समझ लिया। फुटून के पिता नहीं है, उसकी मां गुलाब पत्ती बताती हैं कि वो अपनी बेटी को जीवित देखकर बहुत खुश है, लेकिन उसे इस बात का भी दुख है कि पिछले कई साल उसकी बेटी ने बंधक बनकर गुजारे हैं। किसी तरह पुलिस की मदद से घर पहुंची फुटून उर्फ फूलवंत (13 वर्ष) भी तस्करों के एक गिरोह का शिकार होकर दिल्ली पहुंच गई थी। फुटून बताती है कि जिस कमरे में उसे बंधक बनाकर रखा गया था, वहां 21 और लड़कियां बंद थी। उन्हें कमरे से कभी बाहर निकलने नहीं दिया गया। लेकिन एक दिन फुटून किसी तरह जान बचाकर वहां से भाग निकली। अपने घर पहुंची फुटून बताती है कि उनमें से तीन लड़कियों को बेच दिया गया था, फुटून का सौदा भी सात लाख रुपए में तय हो गया था, लेकिन बेचने वाले उसका दस लाख रुपए मांग रहे थे। यदि सौदा तय हो जाता तो फुटून शायद फिर अपने घर कभी नहीं पहुंच पाती। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। फुटून के हाथ मौका लगा, वो वहां से भाग निकली। नंबवर 2013 में कुछ पड़ोसियों ने उसकी मदद की और पुलिस तक पहुंचाया। फुटून की मां गुलाब तो अपनी बेटी को मृत मान चुकी थी। लेकिन अपनी बेटी को सही सलामत घर में देखकर अब उसका परिवार खुश है। लेकिन फुटून लगातार पुलिस से अन्य बंधक लड़कियों को बचाने की गुहार लगा रही है।
मनरेगा से भी ज्यादा पैसा देने का लालच
नाम यशोदा पिता गजजाराम उइक। उम्र 20 वर्ष। गांव बड़ेजम्हरी जिला नारायणपुर।
नारायणपुर से बड़े जम्हरी जाने के लिए कच्चे रास्ते पर तकरीबन दस किलोमीटर सफर करना होता है। अमूमन लोग बड़े जम्हरी जाते ही नहीं, कारण कि ये गांव नक्सलियों की आवाजाही का केंद्र है। यहां की ग्राम पंचायत अध्यक्ष श्रीमती उइके भाजपा समर्थित हैं। वे कहती हैं कि यहां मनरेगा के लिए मजदूर नहीं मिल रहे, क्योंकि ज्यादा धन की लालच में वे गांव के बाहर काम करने चले जाते हैं। ऐसा कुछ यशोदा के साथ हुआ। उसे भी तस्कर मनरेगा से ज्यादा मजदूरी देने की लालच में तमिलनाडु में बेच आए।
यशोदा उइके (20 वर्ष) पांच बहने हैं। घर की तंग हालात के चलते वो दलाल किज्जूराम के झांसे में फंस गई। यशोदा घर से निकलने के पहले ये तो जानती थी कि उसे दक्षिण भारत की कंपनियों में काम के साथ मोटी रकम भी मिलेगा। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) से भी ज्यादा। उसे लगा इससे घर की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। लेकिन चार माह काम करने के बाद भी यशोदा को फूटी कौडी नसीब नहीं हुई। जब पुलिस यशोदा को नामाक्कल से छुडाकर लाई...तब उसका चेहरा भी झुलस चुका था। दरअसल यशोदा भी द जेम्स एग्रो एक्सपोर्ट्स में बंधक बनाई गई थी। वहां कैमिकल का डब्बा खोलते वक्त उसके हाथ से छूट गया और उसके छींटें पड़ने से यशोदा का चेहरा खराब हो गया। यशोदा बताती है कि उस घटना के दौरान वह बेहोश हो गई थी। लेकिन उसे अस्पताल तक नहीं ले जाया गया। जब वह घर पहुंची तो उसके परिजन उसे देखकर हैरान हो गए। उस पर यशोदा को ना तो कोई हर्जाना मिला ना ही चार माह की कठोर मेहनत की कमाई ही मिली। अब यशोदा अपने घर से बाहर भी नहीं निकलना चाहती।
60 लड़कियां 1 गुसलखाना
नाम सतरी पिता मानूराम पोटाई। उम्र 20 वर्ष। गांव बडे जम्हरी जिला नारायणपुर।
छह सौ लोगों की आबादी वाले गांव बड़ी जम्हरी को यूं तो नक्सल प्रभावित माना जाता है। नारायणपुर से यहां तक पहुंचने के लिए आपको कच्ची पगडंडी का सहारा लेना पड़ता है। विकास के नाम पर केवल यहां हाई स्कूल और सस्ते राशन की दुकान नज़र आती है। यहां की जिन छह आदिवासी लड़कियों को नामाक्कल में बेचा गया था। उनमें सतरी पोटाई (20वर्ष) भी शामिल थी। ये अलग बात है कि गांव में हाईस्कूल होते हुए भी सतरी ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। बड़ी मुश्किल से बात करने को तैयार हुई सतरी ने बताया कि हमारा काम करने का कोई निर्धारित नहीं था। हमें कहीं भी जाने की इजाजत नहीं थी। जहां लड़कियों को बंधुआ मजदूर बनाया गया था, उस फैक्ट्री में एक ही गुसलखाना था। हम 60 लड़कियां थीं। जब रात को हम 8 बजे काम से छूटते तो लड़कियों को बारी-बारी से नहाते-नहाते रात का ग्यारह बज जाता था। कई बार रात में उठाकर हमसे काम करवाया जाता। उसके बाद दूसरे दिन भी नहीं सोने दिया जाता था। अक्सल हमें लगातार काम करना होता था। घर जाने की बात पर कहा जाता कि छह माह होने दो, फिर छुट्टी मिलेगी। सतरी बताती है कि वहां के साहब लोग अंग्रेजी और तमिल में बात करते थे। जब हमें गाली बकते या हम पर गुस्सा होते, तभी हमें समझ में आता था कि वे हम पर किसी बात को लेकर चिढ़ रहे हैं। लड़कियों को आपस में बात करने तक की अनुमति नहीं थी। शुक्र है भगवान का कि हम घर वापस आ पाए।
ये दास्तान केवल सिगाय मंडावी पिता बेजूराम (21 वर्ष) या सतरी पोटाई पिता मानूराम(20वर्ष) की ही नहीं है, बल्कि सुगतीन मंडावी पिता शिवलाल (20वर्ष) हो या बुधयारी वडडे पिता सैंतराम ग्राम जरिया (17वर्ष) या फिर सुकमी वडडे पिता वीरसाय ग्राम टिमनार (18वर्ष), अनीता सलाम पिता बैजूराम (20वर्ष) ग्राम नयानार, सरिता सलाम पिता सिदराय (15वर्ष) ग्राम गोगंला, संताय सलाम पिता लखमुराम (13वर्ष) ग्राम गोगंला हो..तमिलनाडु से छुड़ाई गई सभी 84 लड़कियों की कहानी किसी के भी रौंगटे खड़े करने के लिए काफी है। जो लड़कियां छूट कर आ गईं, वे खुद को खुशकिस्मत मान रही हैं, लेकिन अभी भी जगदलपुर के पास स्थित दरभा से 250 लड़कियों की तस्करी होने यानि उन्हें भी दक्षिण भारत के कारखानों में बंधुआ मजदूरी के लिए बेच दिए जाने की सूचना है। राज्य के दूसरे छोर पर स्थित जशपुर, रायगढ़, सरगुजा, बिलासपुर की भी कई लड़कियों को राज्य की पुलिस हाल ही में दिल्ली और मुंबई से बरामद करके लाई है।
पांच से पचास हजार तक का रेट
स्थानीय तौर पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता हरिसिंह सिदार की मानें तो पिछले पांच सालों में बस्तर की हजारों लड़कियों को बेच दिया गया है। उनके माता-पिता को उनकी कोई खोज-खबर नहीं है। सिदार कहते हैं कि इस पूरी कथा का दुखद पहले ये भी है कि लड़कियों को बेचने और छुडाने के इस गोरखधंधे में बेचने वाले दलाल और छुड़ाकर लाने वाले तथाकथित गैर सरकारी संगठन, दोनों ही लाखों रुपए कमा रहे हैं। पहले दलाल प्रति लड़की को बेचने पर फैक्ट्रियों से न्यूनतम पांच हजार या अधिकतम पचास हजार रुपए प्राप्त करता है। फिर बस्तर में चल रहे कुछ गैर सरकारी संगठन इन लड़कियों को पुर्नवास के लिए मिलने वाली राशि में से अपना हिस्सा निकालने में भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। दरअसल इन लड़कियों को राज्य सरकार के नियम के मुताबिक जिला प्रशासन द्वारा पुनर्वास के लिए एक से तीन लाख रुपए तक की मदद की जाती है। लेकिन पीड़ित लड़कियों के रिकार्डेड बयान में ये बात निकलकर आ रही है कि कुछ तथाकथित एनजीओ लड़कियों को मिल रही मदद से अपना हिस्सा निकालने में परहेज नहीं कर रहे हैं। सिदार बताते हैं कि वे लगातार छूट कर आई लड़कियों के संपर्क में हैं। लड़कियां उन्हें बताती हैं कि उनके क्षेत्र में काम कर रहे कुछ गैर सरकारी संगठनों (जो उन्हें छुड़ाने के अभियान में भी सक्रिय थे) के कार्यकर्ता उन्हें बता रहे हैं कि उन्हें केवल 50 हजार रुपया ही सरकारी मदद के तौर पर मिलेगा। सिदार कहते हैं कि नियम मुताबिक साधारण परिस्थिति में छूट कर आई लड़कियों को कम से कम 1 लाख रुपए बतौर सरकारी मदद मिलने की प्रावधान है। वे इसकी शिकायत स्थानीय प्रशासन से करने की बात भी करते हैं।
नारायणपुर के जिला पंचायत अध्यक्ष विसेल नाग ने तहलका को बताया कि, अभी हमें सूचना मिली है कि कई लड़कियां हैदराबाद में भी बंधक बनाई गई हैं। हम जिला कलेक्टर की मदद से ग्राम पंचायत स्तर पर सर्वे शुरु कर रहे हैं ताकि पता चल सके कि हर गांव से कितनी लड़कियां गायब हैं। दरअसल हम नक्सल प्रभावित इलाकों में रह रहे हैं, ऐसे में लोगों से सीधा जुड़ाव नहीं हो पा रहा है। इसी का फायदा दलाल उठा रहे हैं। पहले नौकरी का झांसा देकर लड़कियां बेची जा रही थीं, अब हमारे इलाकों में मनरेगा और दूसरी योजनाओं के कारण रोजगार की कमी नहीं है, लेकिन दलाल युवतियों को दूसरे लालच देकर बहला लेकर ले जा रहे हैं
बॉक्स
2008 से 2012 तक लापती लड़कियों के सरकारी आंकडे
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रायपुर-1498
बिलासपुर-985
दुर्ग-979
रायगढ़-529
बलौदाबाजार-495
जांजगीर चांपा-467
जगदलपुर-448
कोरिया-410
राजनांदगांव-405
सरगुजा-356
कोरबा-347
सूरजपुर-271
जशपुर-271
महासमुंद-266
बलरामपुर-193
धमतरी-192
कांकेर-161
बलोद-153
बेमेतरा-133
कबीरधाम-133
गरियाबंद-142
मुंगेली-113
बीजापुर-28
कोंडागांव-22
सुकमा-19

नारायणपुर-18

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

अब मिलेगा आदिवासियों को हक

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अपनी तीसरी पारी के शुरुआती कुछ फैसलों से अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे अर्जुनसिंह की यादें ताजा कर दी हैं। रमन सिंह ने पद संभालते ही ऐलान किया कि पांच प्रमुख लघु वनोपजों की शासकीय खरीदी की जाएगी। इससे इन लघु वनोपजों के व्यापार से फल-फूल रहा भाजपा से जुड़ा व्यापारी वर्ग नाराज हो गया है। अब ये लोकसभा चुनाव के पहले आदिवासी मानस को जीतने का कोई फार्मूला है या फिर अपने ही कुछ लोगों के पर कतरने की योजना। कारण चाहे जो भी हो, इस योजना से आम आदिवासी की कुछ तकलीफें तो जरूर दूर होंगी।
अब छत्तीसगढ़ में पांच लघु वनोपजों की सरकारी खरीदी की जाएगी। इसमें इमली, चिरौंजी, कोसा-ककून, महुआ-बीज और लाख शामिल है। इससे जंगलों से इन वस्तुओं को संग्रहित करने वाले आदिवासियों को सीधा लाभ मिल पाएगा। केंद्र और राज्य सरकार, दोनों ही इस फैसले पर सहमत हैं। इसलिए केंद्र भी जल्द ही इन वनोपजों का समर्थन मूल्य भी घोषित करने की तैयारी कर रही है। दूसरी ओर राज्य सरकार लघु वनोपज संघ के मार्फत इस व्यवस्था को पुख्ता बनाने के शुरुआत कर चुकी है। हालांकि 44 प्रतिशत वनों से आच्छादित छत्तीसगढ़ में वनोपजों की शासकीय खरीदी का ऐलान तब किया जा रहा है, जब उसके पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश ने हर्रा, साल बीज समेत कई जंगलों में पैदा होने वाली कई अहम वस्तुओं को राष्ट्रीयकरण से मुक्त कर दिया है। वहीं दूसरे पड़ोसी राज्य ओडिसा ने भी हर्रा, चिरौंजी, कोसा, महुआ बीज, साल बीज और गोंद समेत 91 लघु वनोपजों की शासकीय खरीदी समाप्त कर दी है। लेकिन रमन सिंह ने अपने संकल्प पत्र में किया वादा निभाते हुए ऐलान किया है कि इमली, चिरौंजी, कोसा-ककून, महुआ-बीज और लाख की खरीदी लघु वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से तेन्दूपत्ते की तर्ज पर की जाएगी। राज्य में इन लघु वनोपजों का लगभग 450 करोड़ रूपए का कारोबार है।
मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं कि, “लघु वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से इनकी खरीदी होने पर लगभग 14 लाख वनवासी परिवारों को इनका उचित मूल्य प्राप्त होगा। सरकार पहले इनकी दर निर्धारित करेगी, फिर इनकी खरीदी की जाएगी। जिन क्षेत्रों में इन लघु वनोपजों का उत्पादन होता है, वहां के साप्ताहिक हाट-बाजारों में इनकी खरीदी की व्यवस्था की जाएगी। इसके लिए भी मैंने 19 दिसम्बर को ही मंत्रालय में अधिकारियों की बैठक में उन्हें सभी तैयारी पूर्ण करने के निर्देश दे दिए हैं
जिस तेंदूपत्ता की तर्ज पर पांच अन्य वनोपजों की खरीदी का फैसला लिया गया है। अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने 1988 में तेंदूपत्ता नीति में परिवर्तन करते हुए इसकी शासकीय खरीदी की घोषणा की थी। इसके बाद 1990 में पहली बार तेंदूपत्ता की शासकीय खरीदी की गई। हालांकि तेंदूपत्ता का राष्ट्रीयकरण तो 1964 में ही कर दिया गया था, लेकिन तब इसका सीधा लाभ संग्राहकों को नहीं मिल पाया था। लेकिन अर्जुनसिंह ने सीधे संग्राहकों को लाभ पहुंचाने की नीयत से इसकी नीति में बदलाव किए थे। लेकिन राजनीतिक जानकार बताते हैं कि इसके पीछे की मंशा राजनीतिक लाभ लेने की तो थी ही, साथ ही भाजपा समर्थित व्यापारी वर्ग को कमजोर करने की भी थी। अब रमन सिंह तेन्दूपत्ते की तर्ज पर इमली, चिरौंजी, कोसा-ककून, महुआ-बीज और लाख की खरीदी लघु वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से करने जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा से जुड़े व्यापारी वर्ग ने इसका विरोध शुरु कर दिया है। ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि बस्तर के इलाके में व्यापार-व्यवसाय करने वाले व्यापारी भाजपा के समर्थक माने जाते हैं।
छत्तीसगढ़ लघुवनोपज व्यापार महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव मुकेश धोलकिया इसे अफसरों के तानाशाही फैसले से जोड़कर देख रहे हैं। धोलकिया का कहना है कि नीति निर्धारक आला अफसर पांचों लघुवनोपजों का राष्ट्रीयकरण कर मुक्त और स्वस्थ बाजा की प्रतिस्पर्धा को नकराते हुए खरीदी का रूप बदलना चाह रहे हैं। मुकेश कहते हैं कि इससे वनवासियों का शोषण ही बढ़ेगा। वनोपजों का संग्राहर अपनी उपज को स्थानीय बाजार में ही बेचने को बाध्य होगा। नई नीति के तहत लघुवनोपज को दूसरे स्थानों पर ले जाकर बेचना अपराध हो जाएगा। मुकेश ये भी आरोप लगाते हैं कि प्रदेश में हर्रा का राष्ट्रीयकरण पहले ही कर दिया गया था। राज्य सरकार हर साल औसतन 45 से पचास हजार क्विंटल ही खरीदी कर पाती है। जबकि राज्य में हर्रे का कुल उत्पादन करीब दो लाख क्विंटल है। लेकिन हर्रा की शासकीय खरीदी होने के बाद बचा हुआ हर्रा कोई व्यापारी नहीं खरीद सकता और वह बर्बाद हो जाता है।
बस्तर चेम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज जगदलपुर के अध्यक्ष भंवर बोथरा कहते हैं कि हम ऐसे निर्णयों का पहले भी विरोध जता चुके हैं और भविष्य में भी विरोध करते रहेंगे। हम चाहते हैं कि संग्राहकों को उनकी उपज और संग्रहित वस्तुओं का उचित मूल्य मिले। लेकिन जब एकाधिकार की बात आती है तो चाहे व्यापारी हो या अन्य, वो उत्पादकों का शोषण ही करता है। बोथरा कहते हैं कि जिन वनोपजों की शासकीय खरीदी का ऐलान किया गया है। उसमें इमली भी शामिल है। जबकि इमली वनोपज की श्रेणी में नहीं आती है। भारतीय वन अधिनियम 1927 में इमली को वनोपज में उल्लेखित नहीं किया गया है। अलग-अलग राज्यों ने भी, जहां इमली प्रचुरता में पाई जाती है, इसे कहीं मसाले तो कहीं सब्जी या किराना की श्रेणी में रखा है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक धीरेंद्र शर्मा कहते हैं कि अच्छे कामों का भी विरोध तो होता ही है। सरकार संग्राहक को ही वनोपज का मालिक बनाना चाहती है। उसे उचित मूल्य दिलवाना चाहती है। इसलिए ये फैसला लिया गया है। 1984 के पहले तक यही होता रहा है। लेकिन 1984 के बाद इसे खुले बाजार में बेचने की अनुमति दी गई थी ताकि संग्राहक को बाजार की प्रतिस्पर्धा के चलते सही दाम मिल सके। लेकिन ऐसा हुआ ही नहीं। उल्टे आम आदिवासियों को, जो वनोपज का संग्रह करते हैं, कोई लाभ ही नहीं मिला। इसलिए राज्य सरकार ने वनोपज व्यापार विनियमन अधिनियम 1969 के तहत अब पांच वनोपज की सरकारी खरीदी करने का फैसला लिया है। इसके तहत समर्थन मूल्य तय करके हम वनोपज की खरीदी भी करेंगे। यदि संग्राहकों को खुले बाजार में यदि ज्यादा दाम मिलता तो वे वहां भी अपनी वस्तुएं बेच सकेंगे। लेकिन व्यापारी कम दामों पर उसे नहीं खरीद पाएंगे क्योंकि कम से कम तय समर्थन मूल्य तो संग्राहकों को मिलेगा ही। इसकी खरीदी के लिए राज्य सरकार समानांतर व्यवस्था करेगी ताकि व्यापारियों द्वारा तय मूल्य ना मिलने पर खुद सरकार वनोपज की खरीदी कर सके।
छत्तीसगढ़ का 44 प्रतिशत इलाका वनों से आच्छादित है। वन क्षेत्रफल और वन राजस्व के हिसाब से छत्तीसगढ़ देश का तीसरा बड़ा राज्य है। यहां की जलवायु भी जैवविविधता वाली है। यही कारण है कि यहां हर तरह के वनोत्पाद पैदा होते हैं। लकड़ी के अलावा करीब 200 लघु वन उत्पादों पर स्थानीय आदिवासियों की आजीविका निर्भर रहती है। लेकिन इनका सही दाम संग्राहक यानि जंगलों से बीनने वाले आदिवासियों को नहीं मिल पाता। यहां तक कि बस्तर के आदिवासी चिरौंजी (चारोली) जैसे मेवे को नमक के बदले व्यापारियों को बेच देते हैं। बस्तर के हाट-बाजारों में आज भी वस्तु विनिमय (वस्तु के बदले वस्तु) की प्रणाली चलती है। यही कारण है कि बाहरी व्यापारी भोले आदिवासियों को चावल और नमक देकर मंहगे वनोत्पाद खरीद लेते हैं। जिससे उन्हें उनकी मेहनत का सही प्रतिफल नहीं मिल पाता है।
उच्च पदस्थ एक अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त पर तहलका को बताया कि हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने आदिवासी विधानसभा सीटों पर मुंह की खाई है। बस्तर की 12 सीटों में से 8 सीटें कांग्रेस के खाते में चली गई हैं। आदिवासी मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के लिए राज्य सरकार ने बिचौलियों को दूर कर सीधे जंगल की उपज बटोरने वाले संग्राहकों को उपकृत करने की योजना बनाई है। इसे राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार की मंशा आखिरी व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने की है। यही कारण है कि पांच वनोपजों को सरकारी खरीदी किए जाने का फैसला लिया गया है।
हालांकी बस्तर से भाजपा के सासंद दिनेश कश्यप भी सरकार के इस निर्यण से खुश नजर नहीं आ रहे हैं। वे कहते हैं कि भाजपा की आगामी बैठक में वे इस बात को पार्टी फोरम में रखेंगे। इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में विद्रोह की स्थिति हो गई है।

बहरहाल छत्तीसगढ़ प्रचूर वनसंपदा का मालिक है, लेकिन उसमें रहने वाले वनवासियों को हमेशा ही गरीबी और फांके में जीवन काटना पड़ा है। अगर सरकार की नई योजना से वनवासी ही अपनी उपज का मालिक बन वाजिब हक प्राप्त करता है तो ये उसके लिए किसी वनदेवीसे मिले किसी वरदान से कम नहीं होगा। फिर चाहे इससे मुख्यमंत्री रमन सिंह या फिर उनके दल को आगामी लोकसभा में सियासी लाभ ही क्यों ना मिले। इससे कम से कम कांग्रेस को तो गुरेज नहीं होना चाहिए। आखिरकार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों के पितामाह कहे जाने वाले अर्जुन सिंह भी तो यही दांव-पेंच खेलते रहे हैं।

डोंबारी बुरु

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